सोशल ईविल, life, Society

“अवसर का पल “

आगे बढ़िए परंतु आत्मा की सहमति के साथ

हमारा सारा जीवन एक अवसर के इर्द-गिर्द घूमता है और हमारी कामयाबी और नाकामयाबी के बीच केवल एक क्षण का अंतर होता है और वह है ‘अवसर का पल ‘जिन्हें अवसर मिल जाता है वह जीवन की बुलंदियों को छू जाते हैं और जिन्हें अवसर छूकर निकल जाता है अर्थात जो अवसर का लाभ नहीं ले पाते उनके हिस्से केवल पछतावा रह जाता है !पछतावा उस क्षण को खोने का जो लाभ से परिपूर्ण था और हम छल – कपट का साथ न दे सके !

अंतरमन को टटोलिए

सदैव मन कटोता रहता है कि काश उस पल हमने मन की न सुनी होती ! यहां जब सभी एक दूसरे से छल – कपट करते हैं , तो अगर मैंने भी किसी के साथ छल किया होता तो उससे क्या अंतर पड़ जाता ? क्या केवल हमारे ही बलिदान से दुनिया सुधर जाएगी ? क्या केवल हमारे समझने मात्र से दुनिया समझदार हो जाएगी ? क्या सारा जीवन केवल हम ही लोगों को समझते रहेंगे ? क्या लोग कभी हमें समझने का प्रयास नहीं करेंगे ?……………….आदि !

क्या आप भी असीम संपत्ति के मालिक हैं

हां यह सही है कि मैंने जीवन में कोई खास मुकाम हासिल नहीं किया ! बंगले – गाड़ी – गहने जैसी भौतिक संपत्ति अर्जित नहीं की , मगर मैंने संबंधों को जिया है ! मैंने संबंधों की असीम संपत्ति अर्जित की है ,एक कभी न टूटने वाला विश्वास हासिल किया है !

क्या आप भी मानते हैं कि आप औरों से अलग हैं

आप में से कितने ही लोगों ने जीवन को अपने ही अंदाज में जिया होगा आपके लिए संबंध ही संपत्ति रहे होंगे और संबंधों को ही संपत्ति मान कर आप जीवन में आगे बड़े होंगे ! यदि आप भी उनमें से एक हैं ,तो आपको गर्व होना चाहिए अपने लालन-पालन पर जिसने आपकी अंतरात्मा को जिंदा रखा ,जिसने आप में लोगों को दुख न देने का हुनर जीवित रखा ,स्वयं दुख सहकर भी दूसरों को दुख न देने का आपका यह दृष्टिकोण ही है जो आपको और से अलग बनाता है !

क्या आप भी स्वयं से क्षमा मांगने वालों में से एक है

दूसरे लोगों की तरह आप भी सफल हो सकते थे ,क्या आपने कभी अपनी आत्मा से यह प्रश्न किया है ? और आपके अंतर्मन से यह उत्तर भीअवश्य मिला होगा कि किसी के साथ छल – कपट करके में भी एक सफल व्यक्ति बन सकता था और पश्चाताप से बचने के लिए दूसरों से क्षमा – याचना करके मन का बोझ हल्का कर सकता था ! मगर ,मैंने लोगों से क्षमा – याचना की अपेक्षा स्वयं से क्षमा मांगना अधिक उचित समझा !

यही कारण है कि मैं आज गर्व से कह सकता हूं कि मैं केवल जिंदा दिखाई ही नहीं देता अपितु अंदर से भीे जिंदा हूं और जो अंदर से जिंदा है वास्तव में वही जिंदा है !

कहीं आपके लाभ का मूल्य भी दूसरों की हानि तो नहीं

यहां अवसर के पल से मेरा तात्पर्य नकारात्मक अर्थ में नहीं है कि अवसर का लाभ ही ना उठाया जाए सकारात्मक अर्थों में मेरा तात्पर्य है कि अवसर का लाभ तो उठाया जाना चाहिए परंतु स्वयं के लाभ के साथ-साथ इस बात का ध्यान भी रखा जाना चाहिए कि कहीं हमारे लाभ की कीमत दूसरे की हानि तो नहीं ! आज के इस प्रगतिवादी युग में अवसर का लाभ कौन उठाना नहीं चाहता ? विकास के पथ पर सदैव अग्रसर रहीए ,खूब प्रगति कीजिए भौतिक सुख समृद्धि के साथ-साथ आत्मिक संतुष्टि का भी ध्यान रखिए क्योंकि सहअस्तित्व में ही वास्तविक समृद्धि है !

आत्मा की स्वीकृति

अब प्रश्न यह उठता है कि सही गलत का निर्णय कैसे हो ? तो इसका सबसे उचित मार्ग है अंतरमन ,जब भी आपके समक्ष कोई अवसर आए तो सबसे पहले अपने अंतर्मन को टटोलिए , आत्मा की स्वीकृति ही सही अथवा गलत की निर्णायक होगी ,याद रखिए गलती आप से हो सकती है अंतरात्मा से नहीं !

सदैव उचित मार्ग का अनुसरण कीजिए अगले ब्लॉग में फिर मिलेंगे तब तक के लिए हंसते – रहिए , हंसाते – रहिए ,जीवन अनमोल है मुस्कुराते रहिए !

धन्यवाद

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personality development

“क्या व्यक्ति पूर्णतः विश्वासपात्र है !”

व्यक्ति परिस्थितिवश व्यवहार करता है

आस्था से परे संसार की समस्त वस्तुएं तर्क वितर्क से प्रमाणित व आप्रमाणित है विश्वास भी इससे अछूता नहीं है जो व्यक्ति को विशेष बनाता है ,यही कारण है कि कभी व्यक्ति किसी का विश्वास पात्र बन जाता है तो कभी विश्वासघाती तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य की अस्थाई भावनाएं उसे विचलित करती रहती हैं तत्पश्चात व्यक्ति परिस्थिति वश व्यवहार करता है !

विश्वास के बिना जीवन ही असंभव है

विश्वास एक वृहद शब्द है जिसे अर्जित करने में बरसो लग जाते हैं और टूटने में क्षण भी नहीं लगता !विश्वास घनिष्ठता का द्योतक है मित्र में विश्वास मित्रता को घनिष्ट बनाता है ,संबंधों में विश्वास संबंधों में घनिष्ठता लाता है विश्वास ही है जो जीवन में आगे ले जाता है !

विश्वास एक अटूट बंधन

विश्वास -स्वयं का स्वयं में विश्वास ,एक बच्चे का अपने माता पिता में विश्वास ,माता पिता का अपने बच्चों में विश्वास ,……….विश्वास का यह चक्र निरंतर चलता रहता है !तभी तो माता-पिता को बच्चे बुढ़ापे की लाठी नजर आते हैं और बाल्यावस्था में बच्चों को माता-पिता ही सारा संसार ,परस्पर ना दिखने वाली यह मजबूत डोर हर संबंध में हर स्तर पर देखी जा सकती है !

गलतियों से सीखकर आगे बढ़ें

व्यक्ति कमजोर पड़ सकता है क्योंकि वह एक मनुष्य है इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उसे गलती करते रहना चाहिए इसका तात्पर्य यह है कि गलती से सीख लेकर ,आगे गलती ना करने के प्रण के साथ आगे बढ़ते रहना चाहिए !

विश्वास के दायरे को विस्तृत करैं

संसार में ईश्वर के अतिरिक्त कुछ भी स्थाई नहीं है इसलिए संबंधों को बचाना है तो मन की असंतुलित स्थिति को समझना होगा , परिथितियों के अनुकूल ढलना होगा ,संपूर्ण संसार को बदलने के स्थान पर स्वयं को अनुकूलित करना होगा ,विश्वास के दायरे को बढ़ाना होगा !

विश्वास और अविश्वास के मध्य अंतर

परंतु विश्वास और अविश्वास के मध्य की महीन रेखा के अंतर को भी समझना होगा संबंधों की मिठास विश्वास में है !संबंधों में अविश्वास उस विष के समान है जिसकी एक बूंद भी समस्त संबंधों को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है !

सकारात्मक विश्वास

अतः संबंधों में अविश्वास के साथ हीआस्था को भी सम्मिलित न होने दें क्योंकि आस्था ईश्वर में विश्वास का विषय है और इसे ईश्वर तक ही सीमित रहने दे !व्यक्ति में आस्था का अर्थ होगा अंधविश्वास ,इसका यह तात्पर्य भी नहीं कि संबंधों में संदेह किया जाए क्योंकि संदेश संबंधों को निगल जाता है सफल संबंधों की बुनियाद ही विश्वास है विश्वास अपने सकारात्मक रूप में तटस्थतापूर्ण विश्वास ! व्यक्ति पूर्णता विश्वसनीय है आवश्यकता केवल परिस्थिति विशेष में समझने की है !

संबंधों में विश्वास बनाए lरखिए ,अगले ब्लॉग में फिर मुलाकात होगी तब तक के लिए हंसते – रहिए ,हंसाते -रहिए ,जीवन अनमोल है ! मुस्कुराते रहिए !

धन्यवाद
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life, motivation, personality development, safalta ke mool mantra, Society, solution of a problem

“मानवीय व्यवहार -नियंत्रण आवश्यक क्यों !”

नियंत्रित व्यवहार की आवश्यकता

आत्म संतुष्टि की दृष्टि से तो भावनात्मक होना एक सकारात्मक गुण है क्यूंकि यह सामाजिक आधार पर मान सम्मान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता परन्तु आर्थिक आधार पर संपन्न होने और पद प्रतिष्ठित और आर्थिक आधार पर संपन्न होने के लिए आवश्यक हे की एक नियंत्रित व्यवहार हो !

व्यक्ति तार्किक हो गया

विभिन्न कुशल ,संपन्न और पद प्रतिष्ठित
लोगों को देखकर अन्य लोगों के मन में कुंठा उत्पन्न होती है की सफल व्यक्ति कैसे सफल हो जाते हैं ?उनमें ऐसे क्या विशेष गुण होते हैं जिनके आधार पर वह अन्य की अपेक्षा आर्थिक आधार पर अधिक सफल और व्यवहार कुशल बन जाते हैं ?बस इन्हीं कुछ प्रश्नों की खोज मानवीय व्यवहार को नियंत्रित करने के उद्देश्य से और मानवीय व्यवहार को अधिक वैज्ञानिक बनाने के उद्देश्य से वैज्ञानिक खोजे आरंभ हुईं कई सिद्धांत निर्मित हुए और इस आधार पर व्यक्ति का व्यवहार तार्किक हो गया !

तार्तिकता के सामाजिक आर्थिक प्रभाव

जहां देखो घर -परिवार कार्य व्यापार हर जगह तार्किकता नजर आने लगी जहां सफलता अर्जित हुई वहीं सामाजिक सम्बन्ध अस्त -व्यस्त हो गए क्यूंकि तर्क का एक वैज्ञानिक आधार है और यदि हम संबंधों में तर्क करेंगे तो संबंधों की घनिष्ठता समाप्त होना तो स्वाभाविक ही है !

और यही कारण है कि मन की अपेक्षा मस्तिष्क को अधिक महत्व दिया जाने लगा वह शायद इसलिए क्योंकि लक्ष्य को पाने में भावनाएं बाधक सिद्ध होती हैं इस प्रकार से एक नए मानव का जन्म हुआ जो मन की अपेक्षा मस्तिष्क का अधिक प्रयोग करता है प्रशिक्षणों का दौर आरंभ हुआ और मनुष्यों को मस्तिष्क के आधार पर तैयार किया जाने लगा जिससे आर्थिक विकास को बल मिला !

भावनात्मकता और तार्किकता के मध्य सीमा रेखा सुनिश्चित करें

परंतु कुछ सिद्धांतों को विकसित करने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति पूर्णतः मशीनी हो गया हो हमें सिद्धांतों का अनुसरण तो करना चाहिए परंतु यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि कभी- कभी ‘मस्तिष्क पर मन भारी पड़ जाता है ‘यही कारण है कि धन – दौलत ,ऐशो -आराम से ज्यादा व्यक्ति अपने घर -परिवार -मित्रों व अपने संबंधों को महत्व देता है व्यक्ति की भावनाएं उन रंगों के समान है जो व्यक्ति को अपने रंग में रंग लेती हैं जहां व्यक्ति इंद्रधनुषी रंगों में सुख की अनुभूति करता है !

तर्क भावनाकिसे अपनाया जाये ?

कभी-कभी ही सही परंतु कुछ एक व्यक्तियों के मन में व्यक्ति की तार्किक और भावात्मक छवि के मध्य द्वंद उत्पन्न हो होता ज़रूर है ,प्रश्न यह उठता है कि किसे अपनाया जाए और किसे नहीं ?यह कहना बहुत कठिन होगा क्योंकि दोनों का अपना महत्व है और दोनों ही महत्वपूर्ण है !

तर्कु व भावना दोनों के मध्य सामंजस्य आवश्यक

व्यक्तिक विकास तर्क व भावना दोनों के सामंजस्य पर भर करता है न वह अपनी सहज भावनाओं को छोड़ सकता है न बिश्वास को न ही तर्क को और न अनुभवों को अतः इन्हें छोड़ा नहीं जा सकता अपितु विभिन्न परिस्थितियों में इनकी मात्रा को कम ज्यादा अवश्य किया जा सकता है ,कार्य व्यापार में आपका तार्किक होना आपकी ‘आर्थिक सफलता’ को सुनिश्चित करता है और भावात्मक होना घर- परिवार -मित्रों -संबंधों अर्थात ‘सामाजिक सफलता’ को सुनिश्चित करता है ,व्यक्ति के मन को संतुष्टि दोनों के सामंजस्य से ही मिलती है अतः सम्मिलित रूप से दोनों को ही अपनाया जाना चाहिए !

वास्तविक सफलता सामंजस्य में है अतः सामंजस्यता के साथ आगे बढ़ते रहिए अगले ब्लॉग में फिर मुलाकात होगी ,तब तक के लिए हंसते -रहिए ,हंसाते -रहिए जीवन अनमोल है मुस्कुराते रहिए !

धन्यवाद
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“अस्थायी भावनायें -खाली में आडम्बर ज़्यादा !”

भावनायें ही व्यक्ति को मनुष्य बनती हैं

यह भावनाएं ही है जो व्यक्ति को मनुष्य बनाती हैं सुख-दुख त्याग ,तृष्णा ,करुणा यही भाव तो है जो व्यक्ति को एक दूसरे से जुड़े रखते हैं कभी हर्षोल्लास से सबके जीवन में खुशियां भर देते हैं तो कभी त्याग बलिदान से महान बना देते हैं !

हर भावनात्मक प्रश्न का उत्तर

भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न भावनाओं से संचालित मन केवल कोई मांस का लोथड़ा मात्र नहीं है यह हर भावनात्मक प्रश्न का उत्तर है ,यह एक ही समय में मन में गोते मारने वाली विभिन्न भावनाओं का जन्म स्थान और उनको दुलारने वाला भी यही है !

संपूर्ण जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है

कुछ भावनाएं स्थाई होती हैं तो कुछ अस्थाई इस सम्बन्ध में एक कहावत अत्यधिक प्रसिद्ध है ‘खाली में आडंबर ज्यादा ‘यही कारण है कि अस्थाई भावनाएं अत्यधिक शोर मचाती हैं यहां तक की व्यक्ति का जीवन ही अस्त-व्यस्त हो जाता है !

यही कारण है कि व्यक्ति का व्यवहार निरंतर बदलता रहता है इस बदलते व्यवहार के साथ व्यक्ति का मान सम्मान और प्रतिष्ठा भी प्रभावित होती रहती है !

भावनाओं की सकारात्मकता

यधपि भावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता अपितु आवशयकता है तो भावनाओं को स्थायित्व देने की क्यूंकि सकरात्मदक स्थाई भावनाएँ आपके कार्य -व्यापार और निजी संबंधों के स्थायित्व की गॅरंटी हैं !

एक सामान्य प्रश्न

यदि व्यक्ति इतने बड़े बड़े परिवर्तन ला सकता है तो क्या अपनी भावनाओं को संतुलित कर अपने व्यवहार को नियंत्रित नहीं कर सकता !

हम सभी के मन में कभी ना कभी यह प्रश्न उठता जरूर है और यही कारण है कि दशकों से व्यवहारवादी मानवीय व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए कई सिद्धांत बनाने में लगे हुए हैं कई सिद्धांत बनाए भी जा चुके हैं और उनसे काफी सफलता भी प्राप्त हुई है परंतु यह सिद्धांत केवल कार्य व्यवहार तक ही सीमित हैं !

व्यक्ति कुछ और होने से पहले केवल एक मनुष्य है

मानव व्यवहार वादी ‘ हर्बर्ट साइमन व मेरी पारकर फॉलेट ‘ने इस क्षेत्र में जमकर कार्य किया यहां तक कि मानवीय व्यवहार को विज्ञान का रूप देने का प्रयास भी किया गया परंतु वास्तविकता यह है कि मानव भावनाओं से संचालित होता है और भावनाएं निरंतर बदलती रहती हैं अतः परिवर्तित स्थिति को स्थाई कैसे किया जा सकता है ,यही कारण है कि दशकों के प्रयासों के बाद भी मानव व्यवहार के स्थायित्व संबंधी कोई विज्ञान विकसित नहीं किया जा सका है और वो इसलिए क्योंकि व्यक्ति कुछ और होने से पहले एक मनुष्य है तभी तो व्यक्ति जो महसूस करता है वह बोल देता है ,जो सोचता है वह कह देता है और जो चाहता है वह पा लेता है या कर लेता है !

स्वतः विकसित भावनात्मक सामाजिक सिद्धांत

भले ही मानवीय व्यवहार के संबंध में पूर्णता विज्ञान विकसित करने में हम असफल रहे हो परंतु सामाजिक आधार पर कुछ सिद्धांत स्वत: ही निर्मित हो गए हैं जैसे ‘आप जो बोयेंगे -वही काटेंगे ‘तात्पर्य यह हुआ कि अच्छा करेंगे तो अच्छा पाएंगे और बुरा करेंगे तो बुरा ,यही कारण है कि अच्छा करने वाले व्यक्ति के चेहरे पर आभा और आत्मविश्वास स्पष्ट देखा जा सकता है !

चिंता रहित जीवन

सामाजिक तनाव और चिंता रहित व्यक्ति जो अत्यधिक संतुष्ट दिखाई देता है खुले मन से लोगों का स्वागत करता है और होठों पर सदैव मुस्कुराहट खिली रहती है रहती है ,एक कभी न समाप्त होने वाला आत्मविश्वास इन्हे जीवन के प्रति उत्साही बनाता है ,ऐसे व्यक्ति विभिन्न व्यक्तियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाते हैं कोमल मन, विनम्र स्वभाव और सबको साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति ही उनकी पहचान बन जाती है !

इस ब्लॉग में हम बात कर रहे थे कि व्यक्ति का व्यवहार भावनाओं से किस प्रकार संचालित होता है और वह भावात्मक आधार पर क्या प्राप्त कर सकता है अगले ब्लॉक में हम बात करेंगे व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करना क्यों आवश्यक है तब तक के लिए हँसते -रहिये हँसाते -रहिये जीवन अनमोल है मुस्कुराते रहिये !

धन्यवाद
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“What is the meaning of humility, only with literal humility?” – Tradition superstition and truth

https://translate.googleusercontent.com/translate_c?depth=2&hl=en&nv=1&rurl=translate.google.com&sp=nmt4&u=https://4jeewan.wordpress.com/2019/04/30/httpswww-4jeewan-wordpress-com-kya-vinamrta-se-taatparya-keval-shaabdic-vinamrta-se-he/&xid=25657,15700021,15700186,15700191,15700253,15700256,15700259&usg=ALkJrhghjimbhyzyJ5dnUIVl8Hguq3H16A

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“क्या विनम्रता से तात्पर्य , केवल शाब्दिक विनम्रता से है ?”

विनम्रता से ही व्यक्ति , व्यक्ति है ?

विनम्रता एक भाव है और भाव का संबंध मन से होता है आज के समय में तो विनम्रता की परिभाषा ही पूर्णता परिवर्तित हो गई है कुछ लोग कुछ एक क्षण के लिए विनम्र हो जाते हैं और कुछ लोग कुछ एक क्षण विनम्र रहने के बाद अपनी यथास्थिति में लोट जाते हैं और कुछ कठिन परिस्थितियों से लोट कर विनम्र हो जाते हैं ,विनम्रता का भाव ही व्यक्ति को व्यक्ति बनाता है विनम्रता के अभाव में व्यक्ति को व्यक्ति की संज्ञा भी नहीं दी जा सकती !

ये सामंजस्य का एक भाव है

विनम्रता मन और आत्मा के सामंजस्य से उत्पन्न होती है नम्रता का एक वास्तविक भाव होता है जब हम इसके अभ्यस्त हो जाते हैं तो हमें विनम्रता पूर्ण व्यवहार करना नहीं पड़ता अपितु हो जाता है !

ये व्यक्ति की बुद्धिमत्ता की पहचान है

विनम्रता व्यक्ति की बुद्धिमत्ता का उदाहरण है व्यक्ति जितना अधिक बुद्धिमान होगा उतना ही अधिक अनुशासित व्यवहार करेगा ,तात्पर्य यह हुआ कि विनम्रता व्यक्ति के पालन -पोषण से विकसित होती है यद्यपि व्यक्ति की परवरिश पर उसकी संस्कृति का प्रभाव भी अवश्य पड़ता है ,परंतु कभी-कभी अत्यधिक अनुशासित व्यक्ति भी खींझ खा जाता है इस प्रकार विनम्रता एक आंतरिक लक्षण हैं जो अनायास ही व्यवहार का भाग बन जाता है !

विनम्रता आती कहाँ से है

यह लक्षण व्यक्ति में जन्मजात भी हो सकता है और अभ्यास से प्राप्त भी किया जा सकता है
और समाज व संस्कृति के प्रभाव से स्वत: भी उत्पन्न हो सकता है !

यह सफलता का मूलमंत्र है

जिस प्रकार सूखी मिट्टी पर जल डालकर गीली मिट्टी को मनचाहा आकार दिया जा सकता है ठीक उसी प्रकार ,कठोर से कठोर व्यक्ति से विनम्रता पूर्ण व्यवहार कर मनचाहा परिणाम प्राप्त किया जा सकता है !

विस्मयकारी शब्द

यदि विनम्रता का महत्व ना होता तो कृपया , धन्यवाद ,आदि शब्दों का महत्व भी न होता , हमारे दैनिक जीवन में यह शब्द इतना महत्व रखते हैं जैसे चाय में शक्कर ,आप अनुमान लगा सकते हैं कि शक्कर के बिना चाय का क्या स्वाद ?

ये व्यक्तित्व की मिठास का कारक है

आजकल शुगर फ्री का ज़माना है देखिए शर्करा का कितना महत्व है कृत्रिम ही सही परंतु इसके बिना काम भी नहीं चलता ,जिस प्रकार शरीर को शर्करा ,नेचुरल शुगर या आर्टिफिशियल शुगर अर्थात शुगर फ्री से मिलती हे ठीक उसी प्रकार व्यक्ति के व्यवहार को मिठास नम्रता से मिलती है !

विनम्रता व्यक्ति को सहअस्तित्व के साथ आगे ले जाती है

व्यक्ति का विनम्र व्यवहार उसे उदार बनाता है इस प्रकार एक अहंकार विहीन व्यक्ति की उत्पत्ति होती है ,जो सबका प्रिय बन जाता है ! अहंकारी व्यक्ति सवहित के लिए समाज व परिवार का अहित कर देता है जबकि एक विनम्र व्यक्ति अपनी इच्छाओं को संतुलित कर स्वयं सहित घर परिवार के मान सम्मान की भी परवाह करता है क्योंकि विनम्र होने का तात्पर्य यह नहीं है कि व्यक्ति अपनी इच्छाओं की अभिव्यक्ति ही ना करें ,अंकारी व्यक्ति जहां सब कुछ नष्ट कर देता है वहीं एक विनम्र व्यक्ति सह अस्तित्व के साथ आगे बढ़ता है !

विनम्रतापूर्ण विरोध

विनम्रता व्यक्ति को शिष्ट बनाती है एक शिष्ट व्यक्ति एक अच्छे व्यवहार का उदाहरण प्रस्तुत करता है परंतु ऐसा भी नहीं है कि वह अशिष्ट व्यवहार का विरोध नहीं करता वह विरोध करता है परंतु विनम्रता के साथ जो लोग उसका अपमान करते हैं वह उनका उत्तर उनसे दूरी बना कर और भद्दे प्रश्नों पर मौन होकर देता है !

यह सभ्य लोगों का सिद्धांत है

विनम्रता सभ्य लोगों के सिद्धांत का मानक है जिसका अनुसरण हर कोई नहीं कर सकता इसका अनुसरण केवल वही व्यक्ति कर सकता है जो अंदर से विनम्र हो अथवा जो विनम्रता के लाभों को जानता हो की विनम्रता में सुख है अंतर आत्मा की शांति है !

यदि एक सफल और सुखी जीवन व्यतीत करना है तो विनम्र व्यवहार का उदाहरण प्रस्तुत कीजिए ,अगले ब्लॉग में फिर मिलेंगे तब तक के लिए हँसते- रहिये हँसाते -रहिये ,जीवन अनमोल है मुस्कुराते रहिये !

धन्यवाद
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