life, personality development

“क्या संतुष्टि ही सर्वोपरि है ?”

जो है ,जैसा है ,जितना है उसी में खुश रहिए साधनों की कमी के कारण नकारात्मकता का भाव जागृत ना होने दें कितना सरल होता है ना किसी को ढांढस बाँधाना जब हम किसी को कुछ समझा रहे होते हैं तो यूं प्रतीत होता है जैसे हम आदर्शों की प्रतिमूर्ति हों वास्तव में तो हमारे व्यक्तित्व की परख उन्हीं परिस्थितियों में होती है जब हम परिस्थिति विशेष से गुजरते हैं हैं !

आज हमारे समाज में जितनी भी समस्याएं हैं वो जो ,जैसा और जितना प्राप्त है उससे समझोता न करने के करण ही हैं यह कहना पूर्णतः सत्य नहीं होगा समाज के कुछ लोगों को तो मूलभूत सुविधायें भी उपलब्ध नहीं हैं !

आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग दिन – रात मेहनत करने के बाद भी दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से जुटा पाता है ,कितने ही लोग अधोवस्त्र रह जाते हैं और कितने ही लोगों को सर छुपाने के लिए छत तक नसीब नहीं हो पाती और तो और पीने का पानी भी एक बडी समस्या बना हुआ है !

क्या रोटी ,कपड़ा और मकान Luxurious life की श्रेणी में आते हैं जी नहीं इसके विपरीत एक तथ्य और भी है और वो है संतुष्टि !

प्रश्न यह उठता है कि क्या सभी Luxurious life गुजारने वाले लोग संतुष्ट होते हैं ?तो जवाब होगा नहीं ,क्योंकि सुख सुविधाओं और संतुष्टि में अंतर होता है Luxurious life , हमारी लाइफ को केवल Comfort और स्टाइल देती है !

पैसे से आप बंगला ,मोटर कार और व्हाइट गुड्स खरीद सकते हैं, Social status प्राप्त कर सकते हैं ,समाज में मान -सम्मान प्राप्त कर सकते हैं और अपने आस -पास के लोगों को भ्रम में डाल सकते हैं कि आप कितने -सुखी और संपन्न हैं !

सुखी व संपन्नता दो भिन्न विचार हैं एक अंतर मन की स्थिति का परिचायक है तो दूसरा आपकी बाहरी स्थिति का !

सुख आपकी मनो स्तिथि का परिचायक है जिसका संबंध आपके अंतर्मन से है ,आपका अंतर्मन आपके संबंधों की सुगंध से भी महक सकता है ,संतुष्टि आपको अपने छोटे-छोटे प्रयासों से और किसी के काम आ कर भी मिल सकती है तात्पर्य है कि संपन्नता में सुख व आत्म संतुष्टि की गारंटी नहीं है इसके विपरीत सुख स्वयं में ही संपन्नता लिए हुए है !

जब आप वास्तव में अंदर से सुखी होते हैं तो आपको किसी को बताने की आवशयकता नहीं होती , और न ही हंस के किसी को जताने की क्योंकि आपका व्यक्तित्व खुद ही आईना है और आईना कभी झूठ नहीं बोलता !

आज के दौर में कुछ एक लोगों को छोड़कर संपूर्ण समाज ही संपन्नता पाने की होड़ में लगा हुआ है !

आज भी समाज में सुख व संतुष्टि को महत्व देने वालों की कमी नहीं है समाज का एक बड़ा वर्ग घर परिवार की छोटी-छोटी खुशियों को ही अपनी संपन्नता का आधार मानता है !

प्रत्येक व्यक्ति प्रगति करना चाहता है , आगे बढ़ना चाहता है क्यूंकि जीवन का मूल ही प्रगति है ,इसका तात्पर्य यह है कि लोग हर हाल में खुश रह सकते हैं समृद्धि के साथ भी और समृद्धि के बिना भी यही कारण है कि लोग आज भी घर ,परिवार ,संबंध आदि को अधिक महत्व देते हैं बशर्ते की इनकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे क्योंकि वास्तविक संपन्नता का आधार संतुष्टि ही है !

अगले ब्लॉग में फिर मुलाक़ात होगी तब तक संतुष्ट रहिये हँसते -रहिये ,हँसाते -रहिये जीवन अनमोल है मुसकुरते रहिये !

धन्यवाद

🙏🙏🙏

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8 विचार ““क्या संतुष्टि ही सर्वोपरि है ?”&rdquo पर;

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