personality development, safalta ke mool mantra, Society

” मत सोचिये -लोग क्या कहेंगे ?”

परस्पर निर्भरता

जब भी हम कोई नया कार्य शुरू करने जा रहे होते हैं ,तो हम में से अधिकतर लोग तो यह सोच कर ही डर जाते हैं कि लोग क्या कहेंगे ?लोगों से तात्पर्य सब लोगों से हैंअर्थात परस्पर निर्भरता से है ,वास्तव में परस्पर निर्भरता का अर्थ ही एक दूसरे के बारे में सोचना ,एक दूसरे की आवश्यकताओं को समझना और एक दूसरे के काम आना है !

सकारात्मकता ही हमारी शक्ति है

सकारात्मक अर्थों में निर्भरता का तात्पर्य सकारात्मकता से है , अर्थ ये हुआ की निर्भरता सकारात्मक होनी चाहिए एक ऐसी निर्भरता जो किसी की सफलता का मार्ग प्रशस्त कर सके ,किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सके ,समाज में और संपूर्ण व्यक्तियों के मध्य सामंजस्य स्थापित कर सके ,जहां सब एक दूसरे के बुरे समय में काम आए ,दुखों को बांट सकें और सुखों को चौगुना कर सकें !

होना तो यह चाहिए था लेकिन अगर समाज ही हमारे हर कार्य व्यवहार में नकारात्मक रूप से हस्तक्षेप करने लगे तो इससे ना केवल सामाजिक सौहार्द व सामंजस्य बिगड़ने लगता है अपितु व्यक्ति विशेष या वर्ग विशेष के अधिकारों का हनन भी आरंभ हो जाता है !

अधिकारों का हनन और परिणाम

और बात जब अधिकारों के हनन की आती है तो ” अनुच्छेद – 32 “के तहत भारत का उच्चतम न्यायालय भी माफ नहीं करता तो व्यक्ति या वर्ग विशेष कैसे कर सकता है ?अस्त व्यस्त होते जीवन का अंदेशा व्यक्ति अथवा वर्ग विशेष में क्रांति का संचार कर देता है और फिर आरंभ होता है “व्यक्तिवाद “या “वर्गवाद ” !

युवा वर्ग की सोच

आज का युवा वर्ग अपने अधिकारों के प्रति बहुत सचेत है ,यद्यपि वे स्वयं अपने कर्तव्यों के को निभाना नहीं जानता परंतु अपने अधिकारों का उपयोग बखूबी करना चाहता है यह स्थिति घातक सिद्ध होती है यद्यपि यह शब्द बढ़ती उम्र के विद्रोह की दस्तक होते हैं तथापि कभी कभी सत्य भी होते हैं जो आगे जाकर “विद्रोह” का रूप ले लेते हैं !

हस्तक्षेप एक असहनीय पीड़ा

कई बार देखा गया है कि जब किसी व्यक्ति के जीवन में सफलता का समय ठीक पीक पर होता है ,तभी कुछ संकुचित दृष्टिकोण के लोगों के हस्तक्षेप से व्यक्ति के सपने चकनाचूर हो जाते हैं और एक कसक ता उम्र पीड़ा पहुंचाती रहती समय आगे निकल जाता है परंतु वह दुख व हस्तक्षेप के पल व्यक्ति के जीवन में ठहर जाते हैं और व्यक्ति के मन में हमेशा के लिए एक असहनीय पीड़ा छोड़ जाते हैं !

हार केवल आपकी होगी

याद रखिए कि आप की जीत का सेहरा लोग अपने सर बंधवाने में तनिक भी देर नहीं करेंगे पर अपनी हार के लिए केवल आप ही उत्तरदायी होंगे इसलिए अपने जीवन से ,अपने मन से इस डर को निकाल फेकिये कि लोग क्या कहेंगे ?

हस्तक्षेप की सीमा निर्धारित कीजिए

अपने जीवन में लोगों के हस्तक्षेप की एक सीमा निर्धारित कीजिए ,जीवन आपका है , लक्ष्य आपका है तो निर्णय भी आपका ही होना चाहिए ,आपके भविष्य की चिंता आपके घर -परिवार , मित्रों और आप से ज्यादा किसी को नहीं हो सकती !

जरा सोच कर देखिए कि जब लोगों की बारी आती है तो क्या वह अपने जीवन में आप का हस्तक्षेप स्वीकार करते हैं ?नहीं ना ,तो आप क्यो ? इस विषय पर एक बार ही सही पर सोचियेगा ,जरूर अगले ब्लॉग में फिर मिलेंगे तब तक के लिए हंसते -रहिए ,हँसते – रहिए ,जीवन अनमोल है मुस्कुराते रहिए !

धन्यवाद

🙏🙏🙏

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