देश, सोशल ईविल, deshbhakti, life, nationalism, Society

” खतरे में लोकतंत्र !”

democracy
क्या यही लोकतंत्र है ?

15 विचार “” खतरे में लोकतंत्र !”&rdquo पर;

  1. जब किसी घर की इज्जत या सुरक्षा की बात हो तो किसी एक सदस्य को वरीयता नही देना चाहिए।
    जब किसी देश की बात हो तो किसी एक क्षेत्र विशेष को वरीयता नहीं देना चाहिए।
    समय समय पर बहुत कुछ बदलता है ,जो दिखता है वो होता नही और जो होता है वो दिखता नही।
    परिवर्तन संसार का नियम है।कल जिसको जैसा लगा अपनी मर्जी चलाया और आज कोई और अपनी मर्जी चला रहा है। समय का पहिया घूमता रहता है।
    देश की सीमाएँ जैसा शासक वैसा ही सदैव बदलती रहती है।
    सभ्यता और संस्कृति भी।
    ये देश बहुत विशाल था आज इसकी सीमाएँ सिकुड़ गई। जिम्मेवार कौन?
    यहाँ का शासक या आक्रांता जिसने इसे स्वार्थवश खण्ड खण्ड किया। वो स्वार्थ कुछ भी हो सकता है अपना अपने देश की सीमा बढ़ाना या धार्मिकता।
    मगर सदैव इंसान ही पिसता रहा है,कल भी और आज भी।
    जहाँ तक इस लोकतंत्र का सवाल है जब से हम आजाद हुए तब से अबतक हम जाति और धर्म से ही खेल रहे हैं। आज कोई नई बात नही। हम आजाद भी हुए देश खंडित भी हुआ तब भी हम धर्म धर्म ही खेल रहे थे। उस समय भी तनिक भी इस देश का ख्याल नहीं आया कुछ लोगों को जिसे इस धरती ने पाला और पोषण किया।।
    दरअसल हम सही मायने में शुरू से ही लोकतंत्र में जी ही नही रहे हैं। हो सकता है आप कुछ और कहना चाहती हों मगर ये मेरा निजी राय है।

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    1. बिलकुल मधुसूदन जी ,मैं आपकी बात से पूर्णतः सहमत हूँ !मैं आपके व्यापक दृष्टिकोण के लिए आभारी हूँ !जहां आपने व्यक्ति व क्षेत्र विशेष के सन्दर्भ में बात करते हुए आपने अंत में ये भी कोटे किया की शायद आपने इस सन्दर्भ में न लिखा हो !
      ये तब की बात है जब हमारे देश के हालात समान्य थे और संसद के सत्र चल रहे थे मैंने एक बड़ी विचित्रता देखि जहां हार कोई धार्मिक नारे लगा रहा था !ये पिछ मायने तभी एडिट की थी !यदि कुछ सामान्य व्यक्ति करैं तो चलता है परन्तु यदि जान प्रतिनिधि ऐसा करने लगाईं तो वास्तव में यह एक विचारणीय विषय बन जाता है !मानव से प्रेम व सद्भाव बनाये रखना हर नागरिक की नैतिक ज़िम्मेदारी है !अपने अमूल्य जिचार व्यक्त करने के लिए धयवाद !

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      1. हाँ —-मैंने भी देखा था और सच कहें तो बहुत ही विचित्र और दुखदायी लगा था। नारे वही लगाते हैं जिनके पेट भरे होते हैं मगर जो भूख से मरते रहते हैं उन्हें रोटी चाहिए और कुछ नहीं और ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे में संसद में कोई भी नारा खेदजनक है।

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      2. जी ,आज यूँ प्रतीत होता है जैसे राष्ट्रवाद का झूठा दम्भ भरने वालों की बाढ़ सी आगयी हो इनका ये झूठा दम्भ देश की एकता व अखंडता को कितनी हानि पंहुचा रहा है ये एक विचारणीय विषय है !वास्तव में ये चाल है मुख्य मुद्दों से विचलित करने की !रही बात संसद की तो ये लोकतंत्र का मंदिर है !ये भारतीय जनता की प्रतिनिधित्वकारी संस्था है लोकतंत्र के इस मंदिर का सम्मान होना ही चाहिए !

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