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“उड़ते हैं परिंदे सब ….!”

एक ऐसा जहां हो !

जहां कोई न पशेमा हो !

हो हर कोई जहां अपना !

हर दिल में मुहब्बत हो !

ये मेरा इंडिया

मिले इंसा से जहां इंसा !!

रिश्ता है वही गहरा !!

ये हिन्दू मुसलमा क्या !!

हर दिल में चाहत हो !!

खुले आसमा में जैसे !!!

उड़ते हैं परिंदे सब !!!

एक साथ ज़मी पर यूं !!!

मिलेंगे यहां सब कब !!!

के चैन मिले दिल को !!!

और रूह को राहत हो !!!

23 विचार ““उड़ते हैं परिंदे सब ….!”&rdquo पर;

  1. ना कोई धर्म,ना ईश्वर,ना खुदा होता,
    तो शायद ये जहाँ और खूबसूरत होता।
    बनानेवाले ने हमें जोड़ने को धर्म बनाया,
    मगर उन्हें भी नही मालूम शायद,
    की ये धर्म ही नफरत का कल औजार बनेगा।

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    1. अपने अमूल्य विचार रखने के लिए धन्यवाद!मेरे विचार से धर्म होता न होता ,ईश्वर तो तब भी होता और फिर लोग ईश्वर ,अल्लाह के आधार पर ही विभाजित हो जाते !जी बिलकुल धर्म बनाया गया था सब को जोड़ने और समाज में एक नैतिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए कहाँ खबर थी की इसका कुरूप रूप समाज में अनैतिकता अराजकता और नफरत फैलाएगा !लोगों को जोड़ने की जगह तोड़ने का काम करेगा !😒

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      1. न अल्लाह होता ना ईश्वर से मेरा आशय किताबी अल्लाह और ईश्वर से है न कि सर्वव्यापी ब्रम्ह से। हम नही थे तब भी वो था और हम नही रहेंगे तब भी वो रहेगा।
        हम लौकी को कई नाम से जानते हैं। लोग जगह के अनुसार उसे अलग नाम से जानते हैं। ईश्वर भी एक है नाम अनेक। मगर ये विवाद कैसा। ये नफरत कैसी। खुद को श्रेष्ठ या उस ऊपरवाले का संतान कहना और शेष को शैतान कहने की होड़ कैसी?
        ये सिर्फ सत्ता की लड़ाई मात्र हैं और मिटती सिर्फ इंसानियत है।
        ऐसा सोचनेवालों के लिए तो जहाँ सिर्फ एक धर्म के माननेवाले हैं वहां फिर जन्नत होना चाहिए था।
        मगर वहां भी जहन्नुन दिखता है। मतलब साफ है। एक धर्म का सत्ता बनाने के बाद भी वो कोई अवार्ड नही दे रहा।फिर ये नफरत क्यों?

        काश!
        जैसा आप सोचते हैं वैसा ये जहाँ होता,
        निश्चित ही उस समय
        न अल्लाह होता
        ना ईश्वर।
        मगर वो होता।

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      2. बिलकुल मधुसूदन जी ,काश इंसान सिर्फ इंसानियत से पहचाना जाता और ऐसा तब होता जब इंसान केवल इंसान होता उस असीम अनंत और नश्वर सत्ता ने यदि हम मनुष्यों में समझ का एक अंश और बढ़ा दिया होता तो उस एक अंश ने हमें मानव बना दिया होता !

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