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"वक़्त की तलाश में …..!"

कयामत ,की रात -थी वो !
जब ,उसका – ज़वाल देखा !!
हर एक – शख्स के !!!
लब पे – सवाल देखा !!!!

मुकद्दर , किसी का – यूं !
बिगड़े न – इस तरह !!
अपनों की – थी महफिल !!!
गैरों सा – हाल देखा !!!!

वाबस्ता – जो , नहीं थे !
थे वो भी – वक्त की तलाश में !!
रखते थे – वह ,भी क्या !!!
दिल में – ख्याल ,देखा !!!!

दिल शिकनी – करके भी था !
खुद पर – जिन्हें गुरूर !!
इनायत – का उनकी !!!
क्या-क्या गुमान देखा !!!!

दिल से – निभाए जो !
बस ,शिद्दत – उसी में है !!
नाम के – रिश्तों का !!!
तो बस – कतले आम देखा !!!!

दुनिया है ये – इससे कोई !
तवकको – न कीजिए !!
गुलशन -उजाड़ कर भी !!!!
न ,इसको – मलाल देखा iv

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“शोरो – गुल के दर्मिया सन्नाटा बहुत है !”

मैं बेचैन रहकर ही सही !

हंसता तो हूं !!
तुम तो चैन से रहकर भी !!!

बैचेन रहा करते हो iv


मैंने ,बदल लिया खुदको !
बदले हुए हालातों के साथ !!
तुम आज भी- हालातों का !!!

शिकार रहा करते हो iv


तुमको मेरे हंसने से शिकायत है !
और मुझे गमगीन रहने से !!
फ़िर शिकायत क्यूं !!!
कि कैसे ,इतने iv

पुरसुकून रहा करते हो v


बाहर के शोरो – गुल ,के दरमियान !
सन्नाटा बहुत है !
और उसपे ये शिकायत !!!

के तुम शोर बहुत करते हो !v