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“गुनाहों का आईना !”

देखें जहां क्यूं हर जगह
झूठ कोई ,कोई गुमां

है हर गुनाह -एक आईना !

तुझको समझ – आए ना !!

सब पे नजर -खुद से बेखबर !!!

खुदको ,खुदकी खबर- आए न iv

………………….

देखे जहां -क्यूं हर जगह !

झूठ कोई -कोई गुमा !!

है बेदाग -तू ,दूध सा !!!

और कोई -भाए ना iv

……..………..

आप अल्म -हम बे -अमल !

जिससे मिलो -एक मशवरा !!

हमको जैसे -कुछ आए ना !!!

……………….

है हर तरफ़, रंगो -गुलाल !

फिर -क्यूं है डर !!

ज़िन्दगी ,बेरंग हो जाए न !!!

……………….

क़ातिल ही हो ,है कैद जो !

ये तो जरूरी नहीं !!

रह जाए -बद ,बचा !!!

बदनाम और -हो जाए न iv

…………………

ये ज़िन्दगी है एक सफ़र !

शहरों शहर घूमा मगर !!

मंज़िल तो मगर !!!

लेकिन नज़र आए न iv

18 विचार ““गुनाहों का आईना !”&rdquo पर;

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