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"कब बदलेगी मानसिकता ?"

बड़ा कौन ?कर्म धर्म या वहम !

कभी धर्म की बात करते हो, तो कभी वहम की बात करते हो ,कर्म की बात क्यों नहीं करते ?

लोगों को केवल धर्म या वहम (कट्टरवाद) के आधार पर ही नहीं बांधे रखा जा सकता कर्म के आधार

पर भी बांधे रखा जा सकता है । यदि धर्म और वहम व्यक्ति को बांध पाते ? तो लोग

मेरा – तेरा कर ,धर्म के नाम पर खून ना बहाते

। निसंदेह धर्म सब कुछ हो सकता है परन्तु

खूनी तो कभी नहीं हो सकता । धर्म खूनी हो भी कैसे सकता है ?धर्म तो केवल एक नाम है

धर्म के नाम पर लूट – खसोट ,खूनी उत्पात मचाने वाला असली हैवान तो इंसान है ।

संस्कारों का झूठा दंभ भरने वाले हम जैसे व्यक्तियों के लिए क्या यह चिंतन का विषय नहीं है ?

नैतिक शिक्षा का होता हास उत्तरदाई कौन ?

धर्म का यह झूठा दंभ आया कहां से ? संस्कारों से ? नालत है ऐसे संस्कारों पर जो हमें

रक्तरंजित कर देने वाली सीख दें , धर्म के नाम पर अधर्म को बढ़ावा दें, कहां से आ रही है

यह राक्षसी प्रवृत्ति ?, नैतिक शिक्षा की पुस्तकें भी अपना प्रभाव नहीं दिखा पा रही हैं ,

पुस्तकें अपना प्रभाव दिखा भी कैसे सकती हैं ? जब तक कि परिवार का सहयोग सम्मिलित

ना हो , मां की गोद की शिक्षा कैसे मिले ? जबकि आज की मां के पास समय ही नहीं है ।

स्वयं के विकास और उन्नति के लिए प्रयास करना निंदनीय नहीं है यह तो परिवार की

आर्थिक स्थिति को शिखर पर ले जाने का एक साधन है । जिसका प्रयास अपने – अपने

स्तर पर सभी को करना चाहिए । परंतु परंतु जैसा देखो प्राप्त करने के लिए इस साधन

का प्रयोग किया गया था वह साध्य कहां है यदि साध्य की प्राप्ति के लिए अपनाए गए

साधन को ही सर्वोपरि समझ लिया जाए

तो क्या यह हमारी आने वाली नस्लों के लिए अनुचित नहीं होगा ?

अब यह आपके हाथ है कि आप कर्म प्रधान बनकर धर्म का सम्मान करते हैं या धर्म के

नाम पर झूठे आडंबर को बढ़ावा देकर कर्म की तिलांजलि दे देते हैं ।धर्म का वास्तविक

अर्थ है धारण करना !उदाहरण तो कोई भी दे देता है परंतु आत्मिक रूप से आत्मसात

करना सबके बस की बात नहीं ।

स्वयं को एक वृहद वृक्ष के रूप में स्थापित कीजिए !

भूल गए गीता के निष्काम कर्म की सीख ! जिसमें गीता सिखाती है कि “निष्काम कर्म कर

फल की इच्छा छोड़ दे !” वास्तव में यह हम जैसे तुच्छ प्राणियों के बस की बात नहीं हमें

तो फल चाहिए, और वह भी त्वरित बिना किसी इंतजार के तो हम निष्काम कर्म की

कल्पना कैसे कर सकते हैं ? यह हम मनुष्यों में धैर्य की कमी का परिचायक है , अब आप

कहेंगे कि धैर्य भी कोई सिखाने की चीज है ? तो मैं कहूंगी ! जी बिल्कुल । धेर्य भी आपके

व्यवहार का ही एक अंग है , आपका वही व्यवहार जो संस्कारों से सिंचित होकर नरम मिट्टी

पर संस्कारों के फूल खिला देता है जिस की सुगंध से संपूर्ण वातावरण महकता रहता है

कभी किसी की खुशी की वजह बन कर मुस्कुराता है, तो कभी बिछड़े हुओं को मिलाता है और

जब कभी कोई इस इमारती लकड़ी (बहुमूल्य लकड़ी ) को चिंगारी देकर आपकी आत्मा को

झकझोर भी दे ,तो भी आप दूसरों का घर जलाने के लिए तैयार नहीं होते ,आप उस

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अनबुझी टहनी को काटकर अपने से अलग कर देते हैं और पुनः नई कोपलों के साथ एक

विशाल वृक्ष के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते हैं । सब को प्रश्रय देने वाले एक वृहद वृक्ष के रूप में

प्रस्थापित कीजिए ।

कब बदलेगी मानसिकता ?

आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना प्रत्येक व्यक्ति का एक स्वप्न होता है , और हो भी क्यों ना? धन -दोलत,

मान – प्रतिष्ठा सामाजिक मान-सम्मान के प्रतीक जो ठहरे । आप मान – सम्मान से परिपूर्ण हो ना हो परंतु

आर्थिक रूप से संपन्न होना मानो हर मानव का अधिकार ही हो फिर चाहे इससे समाज में मानवीय मूल्यों

की कमी ही व्याप्त क्यों ना हो जाए ,इससे हमें क्या ? जिससे हमारा उल्लू सीधा हो हम तो उस क्षेत्र में काम

करेंगे ।संपूर्ण समाज को सुधारने का दायित्व हमारा अकेले का थोड़े ही है ! संसार को बदलने का ठेका

थोड़े ही ना ले रखा है ।

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अपना अस्तित्व बनाए रखने के दो ही तरीके हैं या तो आप स्वयं दूसरे के रंग में रंग जाइए या दूसरे को

अपने रंग में रंग लीजिए ! यह वाक्य सुनने में जितना सरल प्रतीत होता है वास्तव में उतना ही कठिन है

यदि होता ? तो समाज में ये बिखराव देखने को नहीं मिलता ! व्यक्ति किसी अन्य के रंग रंग या ना रंगे

यदि इंसानियत के रंग ही रंग जाए ? तो सारी समस्या ही हल हो जाए ।

मूल्यों का अवमल्यन मत होने दीजिए !

जब मूल्यों का अवमूल्यन होता है तो संपूर्ण समाज बिखर कर रह जाता है । मुल्ले आते हैं संस्कारों से

और संस्कार जन्म लेते हैं विचारों से । जिसके विचार उच्च उसके संस्कार उच्च , जिसका व्यवहार उच्च

उसके संस्कार उच्च , जिसमें दूसरों को मान – सम्मान देने की भावना उच्च उसके संस्कार उच्च , जिसकी

उदारता उच्च उसके संस्कार उच्च ।

संस्कारों का सम्मान कीजिए !

अन्य शब्दों में कहा जाए तो व्यक्ति की भावनाएं व उसका व्यवहार उसके संस्कारों से ही संचालित होता है !

व्यक्ति का व्यवहार उसके संस्कारों को दर्शाता है और उसके संस्कार उसके माता-पिता के उच्च आदर्शों को

इसलिए आवश्यक है कि संस्कारों की रक्षा की जाए जो कि हमारे माता- पिता के आदर्शों के परिचायक हैं ।

मानसिकता बदलिए ,माता-पिता के आदर्शों की रक्षा कीजिए !अगले ब्लॉग में फिर मिलेंगे तब तक के लिए

हंसते रहिए हंसाते रहिए जीवन अनमोल है मुस्कुराते रहिए ।

धन्यवाद ।।।🙏🙏🙏।।।

25 विचार “"कब बदलेगी मानसिकता ?"&rdquo पर;

  1. नैतिक शिक्षा लेता कौन है ?
    जिस भी धर्म में दोष है वह धर्म कहलाने के लायक नहीं। संस्कार की बात होती है किंतु अर्थकेन्द्रित दुनिया में जिसमें व्यक्ति भौतिक सुखवादी हो गया त्याग,तप,सेवा कही नहीं टिकते। स्वाद के जीव को अपना ग्रास बना लेते है। खाने के आपको सुंदर फिलोसोफी बतायेगा,शराबी की तरह। हिंसा किसी भी रूप में जायज नहीं । लेकिन जो स्वयं के लिए हिंसा करता उसे वह वाजिब ठहरता है। यह बढ़ते मांसाहार के प्रचलन में देखा जा सकता है।

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    1. यद्यपि नैतिक शिक्षा पुस्तकों का विषय नहीं है ! नैतिकता का गुण ,सोच ,व्यवहार पारिवारिक पृष्ठभूमि से बनता है किसी ने अर्थ के नाम पर नकार दिया, तो किसी ने धर्म के नाम पर कुल मिलाकर आज तो इंसानियत का ही हुआ । बड़े दुख की बात है कि धर्म जिसकी उत्पत्ति ही सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के उद्देश्य से हुई वही समाज की दयनीय स्थिति का कारण बना । हिंसा किसी भी प्रकार से उचित नहीं है । आज मांसाहार को बैन करने की अपेक्षा मांसाहारी सोच को प्रतिबंधित करना अधिक आवश्यक हो गया है ।

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      1. समाजिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए सनातन हिन्दू धर्म नहीं बना है। हमारे यहाँ धर्म की परिभाषा “धारिते इति धर्मा” जो धारण किया जा सके वह धर्म है क्या धारण करेगें। वह है मनुष्यता अब मनुष्यता क्या प्रेम,बंधुता, सबके सुखी होने की कामना। इसी लिए कहा जाता है मनुर्भव ,मनुष्य बनो।
        सनातन हिन्दु धर्म मे कोई चीज कांट्रेक्ट नहीं होती है जो होती है वह स्थायी है,अभिन्न है।

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      2. यूं तो हर धर्म महान है , हर धर्म की अपनी विशेषताएं हैं , हर धर्म ही मानवता का पाठ पढ़ाता है ! बुराई धर्म में नहीं लोगों की मानसिकता में है संकीर्ण मानसिकता के चलते समस्त संसार को संकुचित कर देना चाहते हैं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है , प्रत्येक धर्म अपने अनुयायियों के कर्म का मार्ग प्रशस्त करता है अब यदि वह अपने सीमित अथवा संकुचित ज्ञान के कारण धर्म का उपयोग नकारात्मक रूप से करने लगे तो इसमें धर्म का क्या दोष ।
        कॉन्ट्रैक्ट आधारित तो कुछ भी नहीं होता आजकल तो व्यक्तियों के संबंध ही कांटेक्ट आधारित रह गए हैं ।

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      3. कई धर्म में कमियां है और कई चीजें कॉन्ट्रैक्ट में है यदि उसे वह स्वीकार करले तो इससे मानवता की रक्षा होगी। आपने समाजिक सम्बन्धों के धर्म है यह फसाद कैसा ,पूरा का विश्व एक धर्म के कारण जो अहिंसक और उदार थे वह भी अपनी रक्षा के लिए शस्त्र धारण कर ले रहे।
        यह कोई संकीर्णता नहीं मध्यकालीन उन्माद है हम ऐसा समाज और कानून चाहते है वह नहीं मिला तो लोगों को बम से उड़ा देगें।
        धार्मिक और सामाजिक सहमति के लोगों को मार के स्वर्ग जाने कार्यक्रम कभी नहीं बन सकता।
        राहत जी ज्यादा उदारता प्रदर्शित करेगें तो कट्टरपंथी आपके पीछे पड़ जायेंगे

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      4. एक धर्म के अतिरिक्त मानवता की रक्षा के क्षेत्र का दायरा बहुत विस्तारित है यद्यपि धर्म भी उसमें से एक है मानवता और सामाजिक संबंधों का धर्म तो एक स्वप्न है उदारवादी लोगों का काश ऐसा हो पाता परंतु वास्तविकता से परे है । जहां परस्पर मानवीय आविश्वास व्याप्त हो वहां हिंसा व्याप्त हो ही जाती है यह एक सामान्य प्रवृत्ति है इसे केवल मध्यकाल से जोड़कर ही नहीं देखा जा सकता महान कहे जाने वाले बड़े-बड़े शासक फिर चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान सभी ने अपने साम्राज्य का विस्तार इसी आधार पर किया है यह साम्राज्य विस्तार का एक नकारात्मक पक्ष है परंतु सत्य है । लोगों को मारकर स्वर्ग कोई जा सका है ?

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      5. स्वर्ग में हूरों की कल्पनाओं के लिए विश्वभर में जिहाद छिडा है अच्छे मुसलमान सरेंडर कर दिया आतंकी के आगे। सुधार भय के आगे जाने से होता है इस्लाम का शाह पक्ष निकल के आये। किन्तु हो उल्टा रहा है औरंगजेब को अच्छा दिखाने के लिए एक लोग छः खण्ड में औरंगजेब को दिखाएंगे जल्द ही मार्केट में बुक आने वाली औरंगजेब सत्ता संघर्ष। आगे कोई सरफिरा लिखेगा गजनबी की इस्लाम विजय।। दो शब्द में जो बात कह सकते थे उसे कई खण्ड में गलत को सही ठहरा रहे है।
        अविश्वास की बात है एक समुदाय द्वारा सवर्प्रथम शुरू होता है दूसरा सुरक्षात्मक रुख अपनाने से हो जाता है। सच को बिना स्वीकार झूठ पर चलकर कोई ठोस निर्माण नहीं होता।
        सामाजिक,धार्मिक,आर्थिक आदि आदि।
        उदारता ,प्रेम,युद्ध एक पक्षीय नहीं होता।
        स्त्री भी जब मां बनती है उसे भी अपनी काया और भौतिक सुखों से समझौता करना पड़ता है।

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      6. कमियां सभी धर्म में है समय के साथ सामाजिक नियमों में परिवर्तन किया जाता है सनातन हिन्दु धर्म में जब रूढ़िया आ गयी तो संत खड़े हुए समाज को नयी दिशा देने के लिए। कुछ तो पंथ का आकार ले लिया बौद्ध,जैन, सिख किन्तु कत्लेआम नहीं हुआ।
        उनकी शिक्षाओं को सब ने स्वीकार किया।

        ईसाई धर्म में मार्टिन लूथर किंग ने जर्मनी से जब पोप के खिलाफ प्रोटेस्ट किया तो यही ईसाई में पंथ बन प्रोटेस्टाइन। पुनर्जागरण काल में कापरनिकस और गैलीलियो ने बाइबिल की लाइन को गलत ठहराया।

        शरीयत जिसे इस्लामिक क्रांति करके बार बार लागू किया जाता ,सुधार छोड़िए फिर से मध्यकालीन दौर में ले जाकर पटक दिया जाता। 1980 में ईरान की क्रांति हो या 2011 की जैस्मीन क्रांति। हुआ क्या? शरीयत लागू की गई। जिसमें महिलाओं के तमाम हकूक छीन लिए गये। अवैध संबंध पर उसे पत्थर मार मार के मार दिया जाय। बलात्कार होने पर उसकी अकेले की गवाही से बलात्कार नहीं माना जायेगा। मुख्तारिन माइ के केस में देख सकती है। ईरान और अब इराक,जॉर्डन जो 1980 तक मॉडर्न मुल्क थे आज नारी को बुर्के में कैद कर दिया उसके बुनियादी हक ले लिए गये।
        कैसे हम अतातुर्क मुहम्मद कमाल पाशा की शिक्षाओं और सामाजिक सुधार को भूल गये। लुंगी,बुर्खे,जाली टोपी,सार्वजनिक नमाज पर रोक लगा दी। आधुनिक शिक्षा सबके लिए अनिवार्य करके कोट,हैट कल्चर की बात की।
        खलीफा का पद खत्म किया। तुर्की को विकसित देश बनाया आज तुर्की उन्ही की वजह से इतना विकसित है किंतु एर्दोगेंन फिर से उसे मध्यकाल खींच रहा है।
        मिश्र में आधुनिकता की बात करने वाले राष्ट्रपति अनवर सादात को कट्टरपंथियों ने मार दिया। सबसे बड़ी बात मुहम्मद के वंशज को मारने में हिन्दू,बौद्ध,ईसाई की कोई भूमिका नहीं थी।
        क्यों इस्लाम सुधार नही स्वीकार कर रहा है?
        शरीयत और कट्टरपंथ ही क्यों? काश मैं मुस्लिम होता तो निश्चित ही बुराइयों पर चोट करता जान जाती तो जाती लेकिन सुधार हो कर रहता। जिहाद

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  2. You are absolutely right in the world. In the name of religion, you can’t end up hurting others. Violence is always violence. Religion asks us to love each other without distinction of race or culture. We are human beings, not animals that feed on the pain of others. If you give love, you will receive love. That is the essence of living in peace with your conscience. His poem leaves a lesson to understand what respect for the human being is as such. It instills hope of being better.

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    1. Thank you very much for your great application ,Yes, religion is not the name of hurting anyone at all! Religion teaches love to live in love, makes a human being, teaches us to help each other! The same religion is a true religion that makes a person feel proud to see him happy. Does! Cools the eyes and relaxes the heart, takes everyone along and carries all humans with no discrimination.

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  3. राजनीति के लोग फायदा उठाते हैं अक्ल के कच्चे लोगों का
    और लोग अपना इस्तेमाल होने देते हैं क्योंकि वो अंधे हो चुके हैं
    भगवान ही मालिक है ऐसे लोगो का

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  4. संस्कार विहीन समाज,संस्कार विहीन एवं दयाहीन इंसान जहाँ बढ़ जाए वहाँ अश्क ही अश्क नजर आते हैं।
    संकीर्ण मानसिकता और गलत शिक्षा समाज को खोखला बना देती है।
    बहुत ही तथ्यपरक लेख।👌👌

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