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“शोरो – गुल के दर्मिया सन्नाटा बहुत है !”

मैं बेचैन रहकर ही सही !

हंसता तो हूं !!
तुम तो चैन से रहकर भी !!!

बैचेन रहा करते हो iv


मैंने ,बदल लिया खुदको !
बदले हुए हालातों के साथ !!
तुम आज भी- हालातों का !!!

शिकार रहा करते हो iv


तुमको मेरे हंसने से शिकायत है !
और मुझे गमगीन रहने से !!
फ़िर शिकायत क्यूं !!!
कि कैसे ,इतने iv

पुरसुकून रहा करते हो v


बाहर के शोरो – गुल ,के दरमियान !
सन्नाटा बहुत है !
और उसपे ये शिकायत !!!

के तुम शोर बहुत करते हो !v

swatantra astitva
सोशल ईविल, beauty, humble ,kind and polite, life, Society

“स्त्री ,जो समस्त संसार का आधार है ! स्वयं निराधार कैसे हो सकती है?”

संसार में नारी को निसहाय निर्बल व अबला समझने वालों की कोई कमी नहीं है !नारी अबला नहीं है ,न हीं वह बेचारी है वह तो षड़यंत्र की मारी है! नारी को अबला प्रचारित या घोषित करना इस छदम पुरुषप्रधान समाज का एक दुस्साहस प्रयास मात्र है !प्रेम, मोह- माया व संबंधों के प्रति समर्पण ममता व करुणा के वशीभूत होकर उसने स्वयं ही अपनी प्रगति को बाधित किया है जो कि उसकी कोमल भावनाओं का प्रतीक है उसकी कोमलता से उसकी कमजोरी का अनुमान लगाना पूर्णतःअनुचित है !

महिलाओं के संदर्भ में इस गीत की पंक्तियाँ बहुत सटीक बैठती हैं
कोमल है कमज़ोर नहीं तू !
शक्ति का नाम ही नारी है !!