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“गुनाहों का आईना !”

देखें जहां क्यूं हर जगह
झूठ कोई ,कोई गुमां

है हर गुनाह -एक आईना !

तुझको समझ – आए ना !!

सब पे नजर -खुद से बेखबर !!!

खुदको ,खुदकी खबर- आए न iv

………………….

देखे जहां -क्यूं हर जगह !

झूठ कोई -कोई गुमा !!

है बेदाग -तू ,दूध सा !!!

और कोई -भाए ना iv

……..………..

आप अल्म -हम बे -अमल !

जिससे मिलो -एक मशवरा !!

हमको जैसे -कुछ आए ना !!!

……………….

है हर तरफ़, रंगो -गुलाल !

फिर -क्यूं है डर !!

ज़िन्दगी ,बेरंग हो जाए न !!!

……………….

क़ातिल ही हो ,है कैद जो !

ये तो जरूरी नहीं !!

रह जाए -बद ,बचा !!!

बदनाम और -हो जाए न iv

…………………

ये ज़िन्दगी है एक सफ़र !

शहरों शहर घूमा मगर !!

मंज़िल तो मगर !!!

लेकिन नज़र आए न iv

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“इनसे तो बेहतर मिटटी के थे मकां !”

क्या -क्या रफू करोगे ?

क्या-क्या रफू करोगे !

रह जाएगा निशान !

बारिश के बाद जैसे !

सूखा हुआ मकान !

मिले थे नसीब से तो !!

बिछड़ना भी नसीब था !!

आए यकीन क्यों ना !!

किस्मत का था लिखा !!

अपनी ही है ज़मीन और !!!

अपना ही आसमां !!!

लगता है फ़िर पराया !!!

सारा ही क्यों जहां !!!

शीशे के घरों में i v

पत्थर के लोग हैं i v

इनसे तो बेहतर i v

मिट्टी के थे मकान i v