पिक्साबे
देश, सोशल ईविल, deshbhakti, humble ,kind and polite, life, Mental health and personality development, motivation, nationalism, personality development, safalta ke mool mantra, Society, solution of a problem, Uncategorized

"इंसानियत के रिश्ते सुकून देते हैं ।"

महत्व केवल संबंधों का है

“संबंध” एक बहुत ही सुंदर शब्द है! क्या कभी सोचा है आपने इसका इतना महत्व क्यों है? यदि सत्य कहा जाए तो व्यक्ति के जीवन का सारा दारोमदार इन्हीं पर टिका है ! ये फिर चाहे खून के हो या इंसानियत का सबका अपना एक महत्व है ।
“खून के रिश्ते व्यक्ति को जुनून देते हैं और इंसानियत के रिश्ते सुकून !”  क्या करें ?कहां जाएं ?किसे अपनाएं ? कैसे निर्धारित करें कौन अपना है कौन पराया ?

जीवन में अनुपयोगी कुछ भी नहीं है

कितनी अजीब बात है कि इस पृथ्वी पर व्यक्ति अकेले ही जन्म लेता है पर धीरे-धीरे समस्त संसार से उसका एक संबंध बन जाता है जो व्यक्ति को कई खट्टे – मीठे अनुभव कराता है । “संबंध या संबंधों का जाल “जाल हमेशा हानिकारक नहीं होता ये कभी-कभी  फायदा भी पहुंचाता है इंटरनेट भी एक जाल है क्या यह हमें नुकसान पहुंचाता है ? नुकसान इंटरनेट नहीं पहुंचाता, नुकसान पहुंचाता है उसका दुरुपयोग !और किसी वस्तु का उपयोग निर्भर करता है हमारी मानसिकता  पर । व्यक्ति की मानसिकता जब सब को लाभ पहुंचाने वाली होती है तो वस्तु स्वत: ही उपयोगी बन जाती है ।

त्रिनेत्र विकसित कीजिए

संबंधों के भी अपने प्रकार होते हैं कोई इसे जायज़ – नाजायज में विभाजित कर देता है तो कोई सगे – सौतेले में, कोई इन्हें मन का रिश्ता बताता है तो कोई तन का ।किसी के लिए संबंधों के इतर कुछ भी नहीं और किसी के लिए संबंधों का कोई महत्व ही नहीं ? वास्तव में संबंध नाम है उपरोक्त से इतर भावनाओं का ,यहां मेरा तात्पर्य ज्ञानेंद्रियों के द्वारा उद्धृत  होने वाली भावनाओं से न होकर सिक्स सेंस से उत्पन्न होने वाले त्रिनेत्र से है जो आपको वास्तव में सही गलत का ज्ञान कराता है ।

सांप्रदायिकता की भावना को बलवती न होने दें

यूं तो हर रिश्ते का सम्मान व्यक्ति का परम कर्तव्य है परंतु फिर भी जन्म से ही हमें अपने – पराए का बोध कराया जाता है ताकि हमें हमारे अपनों के प्रति ,हमारे संबंधों के प्रति मन में एक जुनून उत्पन्न हो सके ।परिवार वालों के प्रति प्रेम भाव और सगे संबंधियों के प्रति  निष्ठा भाव उत्पन्न हो सके ! भावनाओं से परिपूर्ण व्यक्ति जब एक समाज में निवास करता है और जब कोई व्यक्ति उसके संपर्क में आता है तो उसके साथ व्यक्ति का संबंध स्वत: ही  बन जाता है कब ये संबंध व्यक्ति को सुकून देने लगते हैं पता ही नहीं चलता !यही कारण है कि इतने बड़े समाज में कई छोटे-छोटे समाज सृजित हो जाते हैं । संबंधों का सकारात्मक पक्ष जितना सुहावना नजर आता है संप्रदायों में विभाजित होकर यह उतना ही नकारात्मक रूप धारण कर लेता है ।सुकून पर जुनून कब हावी हो जाता है पता ही नहीं चलता ।

जीवन की अमूल्य ता का रहस्य

घर परिवार को छोड़ा जा सकता है न समाज को “एक शरीर है तो दूसरा आत्मा “दोनों ही एक दूसरे के बिना निर्मूल हैं और एक सुखी जीवन के लिए संबंध अमूल्य हैं । अतः जीवन का वास्तविक सुख दोनों के सामंजस्य में है ।

सामंजस्य का महत्व

जीवन पथ पर आगे बढ़ते रहने का नाम ही जीवन है  मन व मस्तिष्क का सामंजस्य ही जीवन को सरल और सहज बना सकता है ।अपने त्रिनेत्र का उपयोग करते हुए ,सही गलत का अंतर करते हुए , अपने मार्ग में आने वाली बाधाओं से घबराए बिना जीवन पथ पर आगे बढ़ते रहिए, अपने जुनून व सुकून का सम्मान करने के साथ ही दूसरों के जुनून व सुकून का भी सम्मान करते हुए आगे बढ़ते रहिए ।

जीवन की अविरल तरंगों में निरंतर बहते रहिए

समस्त संसार और इस बृहद संसार में बने व्याप्त विभिन्न समाजों को अपनाते हुए उनकी लय में बढ़ते चलिए !जीवन नाम है तरंगों का इन तरंगों को अविरल रूप से बहने दीजिए विश्व का सृजन करता ईश्वर है और पृथ्वी पर वास करने वाले हम सब प्राणी उसकी संताने हैं बस इसी मनो भावना के साथ विश्व के प्रत्येक प्राणी से प्रेम करते हुए आगे बढ़ते रहिए ।

दूसरों की निष्ठा पर खरा उतरने का प्रयास कीजिए

कौन अपना है कौन पराया ? यह सुनिश्चित करना  सरल नहीं है ! यदि मस्तिष्क से सोचा जाए तो बिल्कुल सरल नहीं है परंतु यदि मन से सोचा जाए तो बिल्कुल कठिन नहीं है तात्पर्य यह हुआ कि ना तो मन से चला जा सकता है और ना ही मस्तिष्क से परंतु दोनों का सामंजस्य ही हमें सत्य का ज्ञान करा सकता है ।परंतु इसके पूर्व यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा कि आप दूसरों से निष्ठा की उम्मीद करते हैं पर आप दूसरों की निष्ठा पर कितना खरा उतरते हैं ।

संबंधों का सार ही सुकून है फिर चाहे वह आपका बनाया हुआ हो अथवा ईश्वर का इसलिए हर संबंध का सम्मान करते रहिए, इंसानियत की राह पर बढ़ते रहिए ।हंसते रहिए – हंसाते रहिए ,जीवन अनमोल है मुस्कुराते रहिए अगले ब्लॉग में फिर मिलेंगे ।

                           धन्यवाद  ।।।🙏🙏🙏।।।


Pixabay.com
देश, सोशल ईविल, deshbhakti, humble ,kind and polite, life, Mental health and personality development, motivation, nationalism, personality development, Society, solution of a problem, Uncategorized

"कब बदलेगी मानसिकता ?"

बड़ा कौन ?कर्म धर्म या वहम !

कभी धर्म की बात करते हो, तो कभी वहम की बात करते हो ,कर्म की बात क्यों नहीं करते ?

लोगों को केवल धर्म या वहम (कट्टरवाद) के आधार पर ही नहीं बांधे रखा जा सकता कर्म के आधार

पर भी बांधे रखा जा सकता है । यदि धर्म और वहम व्यक्ति को बांध पाते ? तो लोग

मेरा – तेरा कर ,धर्म के नाम पर खून ना बहाते

। निसंदेह धर्म सब कुछ हो सकता है परन्तु

खूनी तो कभी नहीं हो सकता । धर्म खूनी हो भी कैसे सकता है ?धर्म तो केवल एक नाम है

धर्म के नाम पर लूट – खसोट ,खूनी उत्पात मचाने वाला असली हैवान तो इंसान है ।

संस्कारों का झूठा दंभ भरने वाले हम जैसे व्यक्तियों के लिए क्या यह चिंतन का विषय नहीं है ?

नैतिक शिक्षा का होता हास उत्तरदाई कौन ?

धर्म का यह झूठा दंभ आया कहां से ? संस्कारों से ? नालत है ऐसे संस्कारों पर जो हमें

रक्तरंजित कर देने वाली सीख दें , धर्म के नाम पर अधर्म को बढ़ावा दें, कहां से आ रही है

यह राक्षसी प्रवृत्ति ?, नैतिक शिक्षा की पुस्तकें भी अपना प्रभाव नहीं दिखा पा रही हैं ,

पुस्तकें अपना प्रभाव दिखा भी कैसे सकती हैं ? जब तक कि परिवार का सहयोग सम्मिलित

ना हो , मां की गोद की शिक्षा कैसे मिले ? जबकि आज की मां के पास समय ही नहीं है ।

स्वयं के विकास और उन्नति के लिए प्रयास करना निंदनीय नहीं है यह तो परिवार की

आर्थिक स्थिति को शिखर पर ले जाने का एक साधन है । जिसका प्रयास अपने – अपने

स्तर पर सभी को करना चाहिए । परंतु परंतु जैसा देखो प्राप्त करने के लिए इस साधन

का प्रयोग किया गया था वह साध्य कहां है यदि साध्य की प्राप्ति के लिए अपनाए गए

साधन को ही सर्वोपरि समझ लिया जाए

तो क्या यह हमारी आने वाली नस्लों के लिए अनुचित नहीं होगा ?

अब यह आपके हाथ है कि आप कर्म प्रधान बनकर धर्म का सम्मान करते हैं या धर्म के

नाम पर झूठे आडंबर को बढ़ावा देकर कर्म की तिलांजलि दे देते हैं ।धर्म का वास्तविक

अर्थ है धारण करना !उदाहरण तो कोई भी दे देता है परंतु आत्मिक रूप से आत्मसात

करना सबके बस की बात नहीं ।

स्वयं को एक वृहद वृक्ष के रूप में स्थापित कीजिए !

भूल गए गीता के निष्काम कर्म की सीख ! जिसमें गीता सिखाती है कि “निष्काम कर्म कर

फल की इच्छा छोड़ दे !” वास्तव में यह हम जैसे तुच्छ प्राणियों के बस की बात नहीं हमें

तो फल चाहिए, और वह भी त्वरित बिना किसी इंतजार के तो हम निष्काम कर्म की

कल्पना कैसे कर सकते हैं ? यह हम मनुष्यों में धैर्य की कमी का परिचायक है , अब आप

कहेंगे कि धैर्य भी कोई सिखाने की चीज है ? तो मैं कहूंगी ! जी बिल्कुल । धेर्य भी आपके

व्यवहार का ही एक अंग है , आपका वही व्यवहार जो संस्कारों से सिंचित होकर नरम मिट्टी

पर संस्कारों के फूल खिला देता है जिस की सुगंध से संपूर्ण वातावरण महकता रहता है

कभी किसी की खुशी की वजह बन कर मुस्कुराता है, तो कभी बिछड़े हुओं को मिलाता है और

जब कभी कोई इस इमारती लकड़ी (बहुमूल्य लकड़ी ) को चिंगारी देकर आपकी आत्मा को

झकझोर भी दे ,तो भी आप दूसरों का घर जलाने के लिए तैयार नहीं होते ,आप उस

Pixabay.com

अनबुझी टहनी को काटकर अपने से अलग कर देते हैं और पुनः नई कोपलों के साथ एक

विशाल वृक्ष के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते हैं । सब को प्रश्रय देने वाले एक वृहद वृक्ष के रूप में

प्रस्थापित कीजिए ।

कब बदलेगी मानसिकता ?

आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना प्रत्येक व्यक्ति का एक स्वप्न होता है , और हो भी क्यों ना? धन -दोलत,

मान – प्रतिष्ठा सामाजिक मान-सम्मान के प्रतीक जो ठहरे । आप मान – सम्मान से परिपूर्ण हो ना हो परंतु

आर्थिक रूप से संपन्न होना मानो हर मानव का अधिकार ही हो फिर चाहे इससे समाज में मानवीय मूल्यों

की कमी ही व्याप्त क्यों ना हो जाए ,इससे हमें क्या ? जिससे हमारा उल्लू सीधा हो हम तो उस क्षेत्र में काम

करेंगे ।संपूर्ण समाज को सुधारने का दायित्व हमारा अकेले का थोड़े ही है ! संसार को बदलने का ठेका

थोड़े ही ना ले रखा है ।

pixabay.com

अपना अस्तित्व बनाए रखने के दो ही तरीके हैं या तो आप स्वयं दूसरे के रंग में रंग जाइए या दूसरे को

अपने रंग में रंग लीजिए ! यह वाक्य सुनने में जितना सरल प्रतीत होता है वास्तव में उतना ही कठिन है

यदि होता ? तो समाज में ये बिखराव देखने को नहीं मिलता ! व्यक्ति किसी अन्य के रंग रंग या ना रंगे

यदि इंसानियत के रंग ही रंग जाए ? तो सारी समस्या ही हल हो जाए ।

मूल्यों का अवमल्यन मत होने दीजिए !

जब मूल्यों का अवमूल्यन होता है तो संपूर्ण समाज बिखर कर रह जाता है । मुल्ले आते हैं संस्कारों से

और संस्कार जन्म लेते हैं विचारों से । जिसके विचार उच्च उसके संस्कार उच्च , जिसका व्यवहार उच्च

उसके संस्कार उच्च , जिसमें दूसरों को मान – सम्मान देने की भावना उच्च उसके संस्कार उच्च , जिसकी

उदारता उच्च उसके संस्कार उच्च ।

संस्कारों का सम्मान कीजिए !

अन्य शब्दों में कहा जाए तो व्यक्ति की भावनाएं व उसका व्यवहार उसके संस्कारों से ही संचालित होता है !

व्यक्ति का व्यवहार उसके संस्कारों को दर्शाता है और उसके संस्कार उसके माता-पिता के उच्च आदर्शों को

इसलिए आवश्यक है कि संस्कारों की रक्षा की जाए जो कि हमारे माता- पिता के आदर्शों के परिचायक हैं ।

मानसिकता बदलिए ,माता-पिता के आदर्शों की रक्षा कीजिए !अगले ब्लॉग में फिर मिलेंगे तब तक के लिए

हंसते रहिए हंसाते रहिए जीवन अनमोल है मुस्कुराते रहिए ।

धन्यवाद ।।।🙏🙏🙏।।।