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"नारी विजयी बन जाती !"

न दर्द की मारी – बन जाती i
न फिर – बेचारी बन जाती ii
जो आज – उठा लेती खंजर iii
न निर्बल बेचारी -बन जाती iv

आवाज उठाओ – संघर्ष करो i
सौगंध उठाओ – अब ना डरो ii
बच जाती – निर्भया ,प्रियंका iii
जो न अबला – बन जाती iv

ना मर्दों की – भीड़ है i
चार पुरुषों की – जंजीर है ii
अगर न होता – पुुुुुरूष गैंग में

नारी विजयी -बन जाती iv

ना भूलो के – माता है i
नारी ,बहन – तुम्हारी है ii
आज न तुम – सम्मान करो iii
कल ,तुम्हारी – बारी है iv
इंसानियत से – सोचते गर v
बहन तुम्हारी – बन जाती vi

किसलिए
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“एक सोच -किस लिए !”

 ये भुलावा किस लिए
ये भुलावा किस लिए

कुछ नहीं है ज़िन्दगी में फिर दिलासा किस लिए !

रंजो गम हैं बिखरा हर सू फिर तमाशा किसलिए !!

हर लम्हा एक सदी सा -लम्बा है यूँ इंतज़ार !

है न परवाह किसी की फिर दिखावा किसलिए !!

फिर भी हर पल मुस्कुरायें ये छलावा किस लिए !!

आरज़ू ए गम छुपा है साथ हर एक सोच के !

बन गया पत्थर ये दिल आँख भी पथरा गयी !

आज दिल की मजलिस में हुए नाकाम हम !

ज़ख्म जब कोई नहीं तो फिर ये छाले किस लिए !!

हैं अकेले जो अगर तो भीड़ ये फिर किसलिए !!

गुलशन के बीच काँटे न चुभे मुमकिन नहीं !

सिर्फ फूलों की तमन्ना फिर भला किस लिए !!

नाकामियों के दरमियान जब उम्मीद भी कोई नहीं !

फिर परेशां क्यों है दिल फिर दुआयें किस लिए !!