सोशल ईविल

“एक प्रशन ?”

हम सभी मनुष्य कितने स्वार्थी होते जा रहे हैं एक तरफ तो हमें परिवार समाज सुख-समृद्धि की लालसा है और दूसरी और पारिवारिक और सामाजिक प्रतिबद्धता से खींझ ,अर्थ यह हुआ कि सुख समृद्धि का भोग तो करना चाहते हैं पर अपनी शर्तों पर !

सामाजिक पद प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए परिवार का गठन किया जाता है वैवाहिक सम्बन्ध बनाये जाते हैं परंतु आज के दौर में संबंध कितने खोखले होते जा रहे हैं इसका अनुमान दिन प्रतिदिन होने वाली डिवोर्स (सम्बन्ध – विच्छेद )जैसी घटनाओं से लगाया जा सकता है !

आज से लगभग एक – दो दशक पूर्व तक तलाक जैसे मामले पूर्वी देशों की अपेक्षा पश्चिमी देशों में ही अधिक देखने को मिलते थे और इसका एक प्रमुख कारण था अस्तित्व की पहचान या प्रगतिवादी दृष्टिकोण और इस दृष्टिकोण का प्रमुख कारण था मनोभावनाओं का अभाव और आसंवेदनशीलता !

देखते ही देखते पश्चिमी देशों की इस परंपरा ने कब पूर्वी देशों में जड़े जमाली पता ही नहीं चला यद्यपि इस एक दशक में भारत जैसे पूर्वी देशों में नई तकनीकों का खूब विकास हुआ सूचना क्रांति और सामाजिक नेटवर्किंग की मानो बाढ़ सी आ गई वैश्विक संबंधों का विस्तार हुआ यद्यपि इसका लाभ व्यापार-व्यवसाय में भी देखने को मिला परंतु समाज पर इसका जो नकारात्मक प्रभाव पड़ा वह था विपरीत लिंगों के मध्य चैटिंग के माध्यम से मित्रता को बढ़ावा मिलनाऔर कब यह मित्रता का प्रेम संबंधों में बदल गई और कब यह प्रेम संबंध वैवाहिक संबंधों में परिवर्तित हो गए पता ही नहीं चला

और वह कहां जाता है ना कि जितनी तेजी से ग्राफ ऊपर की ओर जाता है उतनी ही तेजी से नीचे भी खिसक जाता है कुछ ऐसा ही परिणाम इन संबंधों का भी हुआ तातपर्य यह है कि कुछ औसत संबंध ही सफल हुए और बाकी अपनी आरंभिक अवस्था में ही अविश्वास की बलिवेदी पर चढ़ गए और वह भी मान मर्यादा की परवाह किए बिना !

वास्तव में इन संबंधों को संबंधों की श्रेणी में रखा भी जाना चाहिए या नहीं ?यह एक विचारणीय विषय है आज के दौर में संबंधों में परस्पर प्रेम विश्वास की अपेक्षा ऊपरी सामाजिक प्रतिष्ठा अधिक महत्वपूर्ण हो गई है जहां मान मर्यादा के लिए कोई स्थान नहीं है खोखले आदर्शों की गुल्लक में आडंबरों के अतिरिक्त मानो कुछ नहीं है !

आत्मनिर्भरता के परिणाम स्वरुप प्रगति के नाम पर मनुष्य मैं मनुषत्व का हाथ होता जा रहा है नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है इसका एक प्रमुख कारण पारिवारिक विभाजन भी है ! परिणाम स्वरूप समाज पर कुछ महत्वपूर्ण नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहे हैं एक प्रगति सच्चे संबंधों को निकल गई और शेष बचे हुए संबंध अविश्वास की बलि चढ़ गए दूसरा युवाओं में आदर्शों और मूल्यों का ज्ञान ,नैतिक शिक्षा की पुस्तकों तक ही सीमित रह गया इन दोहरे प्रभावों से ना केवल संबंध – विच्छेदन को बढ़ावा मिला बल्कि आगामी पीढ़ी में आसहनशीलता व आसंवेदनशीलता का भाव जागृत हुआ इससे एक तरफ जहां संबंध विच्छेदन में वृद्धि हुई वहीं विवाहेत्तर संबंधों को भी बढ़ावा मिला है ! हर कोई स्वतंत्रता का पक्षधर है और स्वतंत्रता को बाधित किया भी नहीं जाना चाहिए परंतु स्वतं

त्रता कितनी और किस अर्थ में ? इस पर विचार अवश्य किया जाना चाहिए !

वास्तव में परिवार समाज सुख और समृद्धि परस्पर संबंधित हैं इन्हें प्रतिबद्धता के आधार पर ही बांधे रखा जा सकता है और यह तभी संभव है जब कोई मध्य विकल्प ढूंढा जाये जिससे परिवार व समाज की सुख-समृद्धि भी बनी रहे और वैचारिक स्वतंत्रता भी बाधित ना हो संबंधों को बनाना जितना सरल है उन्हें निभाना उतना ही कठिन यही संबंध आपकी सुख-समृद्धि का मार्ग हैं बस यह सुख समृद्धि के बदले में आपसे थोड़ी सी प्रतिबद्धता की मांग करते हैं जो परस्पर विश्वास बनाये रखने के लिए ज़रूरी भी है आपकी प्रतिबद्धता आपके परिवार का सम्मान और आपके बच्चों का भविष्य सुरक्षित करती है एक बार ही सही पर इस विषय पर विचार अवश्य कीजियेगा !

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धन्यवाद

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