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“तितलियों की व्यथा”

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स्वतंत्र अस्तित्व :-तितलियाँ तितलियाँ देखने में कितनी सुंदर प्रतीत होती है ,यह शब्द सुनने में जितना सुकून देता है देखने में आंखों को उतनी ही ठंडक, जिसे सुनते ही मन में रंग बिरंगे पंखों वाली एक स्वतंत्र सी कल्पना हूंके मारने लगती है !यह शब्द सुनने में जितना अच्छा लगता है इसका उपयोग करने वाला व्यक्ति इसे कहीं अधिक प्रसन्न और प्रफुल्लित नज़र आती है !

एक दूसरे की परिचायक :-स्त्री और तितली दोनों एक दूसरे की परिचायक हैं होना तो यह चाहिए कि जब प्रकृति ने दोनों को समान रूप से सुंदर बनाया एक को पंखों की और दूसरी को वैचारिक उड़ान दी तो हम कौन होते हैं उनके पंख कतर कर उन्हें निर्बल करने वाले विचारों के पर कतर कर उन्हें असहनीय पीड़ा देने वाले !

स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को समाज के खोखले बंधनों में न बांध उसकी वैचारिक उड़ानों को आकाश दीजिए यह रीति रिवाज समाज के बनाए हुए कायदे-कानून हैं ,रीति -रिवाजों से परे भी एक दुनिया है और वह हे सपनों की दुनिया !

सरकारी आंकड़े और वास्तविकता :यद्यपि मैं जानती हूं कि मेरे कई मित्रों के मन में यह विचार आ सकता है कि आज तो महिलाएं पहले से कई ज्यादा ! आत्मनिर्भर हैं पढ़ी-लिखी और प्रत्येक क्षेत्र में नाम कमा रही हैं परंतु यह तो एक निरंतर चलायमान प्रक्रिया है जो प्राचीन काल से चली आ रही है और निरंतर चलती रहेगी यद्यपि यह सत्य है कि महिलाएं प्राचीन काल की अपेक्षा काफी आत्मनिर्भर हो गयी हैं और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी परंतु यदि हम केवल भारत का ही उदाहरण ले तो अभी भी राजस्थान ,हरियाणा जैसे कई राज्यों में महिलाओं की निंदनीय स्थिति से मानव मन अछूता नहीं है सरकारी आंकड़े कुछ और दर्शाते हैं और वास्तविकता बिलकुल इसके विपरीत है !

आर्थिक आत्मनिर्भरता की वास्तविकता :-चलिए कुछ समय के लिए आर्थिक स्वतंत्रता के आधार पर ही महिलाओं की स्थिति का आकलन कर लेते हैं क्या आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलाएं पूर्णता सुरक्षित हैं घरेलू हिंसा से,भावनात्मक पीड़ा से, क्या उनके संबंध पूर्णता सुरक्षित हैं कहीं उनकी डिग्निटी की वजह, उनसे लगाव, प्रेम भाव न होकर उनकी सैलरी तो नहीं !

समबन्धों को समर्पित :आज आत्मनिर्भरता के इस दौर में यद्यपि महिलाओं की सोच में बहुत परिवर्तन आया है परंतु अभी भी लगभग 90% महिलाएं संबंधों को अधिक महत्व देती हैं तभी तो घर परिवार के दायित्वों के निर्वहन में संतुष्टि का अनुभव करती हैं !

तात्पर्य यह है कि नारी स्वतंत्र है उसे स्वतंत्र ही रहने दें उस पर पहरे ना बैठायें अपने संबंधों को निभाना वह बखूबी जानती है रीति-रिवाजों के नाम पर उस पर बंधन न लगायें उससे उसके विकास के अवसर ना छीने सकारात्मक वैचारिक स्वतंत्रता को बाधित ना करें !

धन्यवाद
🙏🙏🙏

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