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“इनसे तो बेहतर मिटटी के थे मकां !”

क्या -क्या रफू करोगे ?

क्या-क्या रफू करोगे !

रह जाएगा निशान !

बारिश के बाद जैसे !

सूखा हुआ मकान !

मिले थे नसीब से तो !!

बिछड़ना भी नसीब था !!

आए यकीन क्यों ना !!

किस्मत का था लिखा !!

अपनी ही है ज़मीन और !!!

अपना ही आसमां !!!

लगता है फ़िर पराया !!!

सारा ही क्यों जहां !!!

शीशे के घरों में i v

पत्थर के लोग हैं i v

इनसे तो बेहतर i v

मिट्टी के थे मकान i v

किसलिए
सोशल ईविल, life, shayree, Society

“एक सोच -किस लिए !”

 ये भुलावा किस लिए
ये भुलावा किस लिए

कुछ नहीं है ज़िन्दगी में फिर दिलासा किस लिए !

रंजो गम हैं बिखरा हर सू फिर तमाशा किसलिए !!

हर लम्हा एक सदी सा -लम्बा है यूँ इंतज़ार !

है न परवाह किसी की फिर दिखावा किसलिए !!

फिर भी हर पल मुस्कुरायें ये छलावा किस लिए !!

आरज़ू ए गम छुपा है साथ हर एक सोच के !

बन गया पत्थर ये दिल आँख भी पथरा गयी !

आज दिल की मजलिस में हुए नाकाम हम !

ज़ख्म जब कोई नहीं तो फिर ये छाले किस लिए !!

हैं अकेले जो अगर तो भीड़ ये फिर किसलिए !!

गुलशन के बीच काँटे न चुभे मुमकिन नहीं !

सिर्फ फूलों की तमन्ना फिर भला किस लिए !!

नाकामियों के दरमियान जब उम्मीद भी कोई नहीं !

फिर परेशां क्यों है दिल फिर दुआयें किस लिए !!