shayree

” तो ये सिम्तों में बटा क्या है !”

वक्त सिलसिला है !कब रुका है ?कब थमा है ?

कब बदल जाये ? कोई जाने नहीं !

कभी मौसम !कभी सावन !!

दिल जो टूटे तो ये – खुद ही दवा है

वक़्त क्या है ?सिलसिला है !

हम हैं मेहफ़ूज़ बहुत , यूं हमें लगता है !

वक़्त कह देता है लेकिन ! सच क्या है ?

वो शहर भी , है शजर भी, वो हवा है, वही दर भी !

सब गुज़र जाता है ,तो ये माजरा क्या है ?

नम आखों मैं छुपा है !क्या राज़ कोई गहरा ?

ये गम जो नहीं !तो भला क्या है ?

कोई अपना या पराया ,कुछ नहीं होता !

है अगर सच , तो ये सिम्तों में ,बटा क्या है ?

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किसलिए
सोशल ईविल, life, shayree, Society

“एक सोच -किस लिए !”

 ये भुलावा किस लिए
ये भुलावा किस लिए

कुछ नहीं है ज़िन्दगी में फिर दिलासा किस लिए !

रंजो गम हैं बिखरा हर सू फिर तमाशा किसलिए !!

हर लम्हा एक सदी सा -लम्बा है यूँ इंतज़ार !

है न परवाह किसी की फिर दिखावा किसलिए !!

फिर भी हर पल मुस्कुरायें ये छलावा किस लिए !!

आरज़ू ए गम छुपा है साथ हर एक सोच के !

बन गया पत्थर ये दिल आँख भी पथरा गयी !

आज दिल की मजलिस में हुए नाकाम हम !

ज़ख्म जब कोई नहीं तो फिर ये छाले किस लिए !!

हैं अकेले जो अगर तो भीड़ ये फिर किसलिए !!

गुलशन के बीच काँटे न चुभे मुमकिन नहीं !

सिर्फ फूलों की तमन्ना फिर भला किस लिए !!

नाकामियों के दरमियान जब उम्मीद भी कोई नहीं !

फिर परेशां क्यों है दिल फिर दुआयें किस लिए !!