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“उड़ते हैं परिंदे सब ….!”

एक ऐसा जहां हो !

जहां कोई न पशेमा हो !

हो हर कोई जहां अपना !

हर दिल में मुहब्बत हो !

ये मेरा इंडिया

मिले इंसा से जहां इंसा !!

रिश्ता है वही गहरा !!

ये हिन्दू मुसलमा क्या !!

हर दिल में चाहत हो !!

खुले आसमा में जैसे !!!

उड़ते हैं परिंदे सब !!!

एक साथ ज़मी पर यूं !!!

मिलेंगे यहां सब कब !!!

के चैन मिले दिल को !!!

और रूह को राहत हो !!!

shayree

” तो ये सिम्तों में बटा क्या है !”

वक्त सिलसिला है !कब रुका है ?कब थमा है ?

कब बदल जाये ? कोई जाने नहीं !

कभी मौसम !कभी सावन !!

दिल जो टूटे तो ये – खुद ही दवा है

वक़्त क्या है ?सिलसिला है !

हम हैं मेहफ़ूज़ बहुत , यूं हमें लगता है !

वक़्त कह देता है लेकिन ! सच क्या है ?

वो शहर भी , है शजर भी, वो हवा है, वही दर भी !

सब गुज़र जाता है ,तो ये माजरा क्या है ?

नम आखों मैं छुपा है !क्या राज़ कोई गहरा ?

ये गम जो नहीं !तो भला क्या है ?

कोई अपना या पराया ,कुछ नहीं होता !

है अगर सच , तो ये सिम्तों में ,बटा क्या है ?