personality development

अशांत मन की पीड़ा -उत्तरदायी कौन ?

चिता और चिंता (pyre and worry)

चिंता से तनाव उत्पन्न होता है जिसका स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और कई शारीरिक व मानसिक समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं !

चिंता अधिक गंभीर विषय है की चिता (Anxiety is a more serious subject than पयरे)

जिसने जनम लिया है ,उसे मृत्यु का स्वाद भी चखना है यही एकमात्र सत्य है और जो सत्य है ,उस पर संदेह कैसा ? इस प्रकार चिता तो नि: संदेह है आज नहीं तो कल , हम ये जानकर भी स्वप्न सजाना नहीं छोड़ते और छोड़ें भी क्यूं ये ख्वाब ही तो हैं जो हमारे जीवन को दिशा देते हैं तात्पर्य ये हे की जब हम मौत जैसी चीज़ की चिंता नहीं करते तो जीवन में आने वाली छोटी -मोटी समस्याओं से चिंता ग्रस्त होकर तनाव ग्रस्त क्यों हो जाते है ?

प्रश्न ये उठता है की चिंता किसकी की जाये (The question is arises that what can be done to worry)

चिंता तो जीवित व्यक्ति की ,की जानी चाहिए ! चिता की चिंता तो समस्त संसार करता है !कहा जाता है की चिंता -चिता के समान होती है परन्तु चिंता व चिता दोनों परस्पर एक दूसरे से संबंधित नहीं है केवल चिंता ही चिता से संबंधित है क्यूंकि चिंता जीवित व्यक्ति को मृत्यु शैया पर पहुंचा देती है जबकि चिता तो स्वाहा हो जाती है (pyre becomes burn) !

और चिता कुछ परिचितों और कुछ आ परिचितों की उपस्थिति में स्वाहा(burn)हो जाती है तो इसे चिंता कैसी ? चिंता तो चिता को देखकर अपने पराए लोग दिखाते हैं तात्पर्य यह हुआ कि चिंता का संबंध संभावित भविष्य को लेकर लगाए जाने वाले अनुमानों से होता है !

चिंता का नकारात्मक प्रभाव ये पड़ता हे की व्यक्ति की सोच ही नकारात्मक हो जाती है !(The negative effect anxiety is that the person’s thinking becomes negative)

चिंता व्यक्ति को नाकारा बना देती है व्यक्ति को लगने लगता है जैसे उसके साथ अब तक सब कुछ बुरा ही बुरा होता आया है और शायद आगे भी ऐसा ही होता रहेगा व्यक्ति खोया खोया रहने लगता है , मन में नकारात्मक विचार घर कर जाते हैं ,व्यक्ति काम करना तो चाहता है परंतु कर नहीं पाता ,जीवन आलस्य से भर जाता है ऐसे में व्यक्ति कार्य की चिंता तो करता है परंतु कार्य नहीं !

प्लानिंग चलती रहती है भावनाएं कल्पनाओं की उछाल मारती रहती हैं विचार इतने ऊंचे कि गगन छू ले पर प्रयास एक सीढ़ी भी न चढ़ने का ,परिणाम स्वरूप व्यक्ति जहां का तहां अर्थात आरंभिक बिंदु पर लौट आता है और तब शुरू होता है चिंतन और वह भी !नकारात्मक चिंतन !

व्यक्ति दोषारोपण करने लगता है (starts blaming)
मेरा कोई काम ठीक से क्यों नहीं होता ?मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है ?ऊपर वाले को मेरे साथ ही ऐसा करना था ?मैं सबके लिए कितना सोचता हूंमेरे लिए कोई क्यों नहीं सोचता ? अबसे मैं भी किसी के लिए कुछ नहीं करूंगा आदि -आदि !

व्यक्ति अकेला हो जाता हे (Human become alone)

गलत चिंतन से उसके सारे कार्य भी गलत दिशा में चलने लगते हैं और इस प्रकार व्यर्थ के कार्यों में व्यर्थ की सोचो से तन व मन दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है व्यक्ति विभिन्न रोगों का शिकार होता जाता है और अंततः शरीर बीमारियों का घर बन जाता है ऐसे में ,व्यक्ति दोस्त व परिवार सब से कट जाता है !

भ्रम पैदा हो जाता है (illusion arises)

दोस्तों व परिवार की अनदेखी तो वे स्वयं करता है पर उसे यह बात कहीं अंदर ही अंदर परेशान करती रहती है कि यह सब मुझे नेगलेक्ट क्यों कर रहे हैं और व्यक्ति सबसे नाराज़ रहने लगता है इससे मस्तिष्क पर इतना गहरा दबाव पड़ता है कि व्यक्ति तनाव ग्रस्त हो जाता है !

सायकोलॉजिस्ट की ज़रुरत (Need of psychologist)

कई बार तनाव इतना बढ़ जाता है कि व्यक्ति कई चीजें भूलने लगता है उसे याद ही नहीं रहता कि उसने खाना भी खाया अथवा नहीं उसने कोई सामान कहाँ रखा अथवा कहाँ नहीं इन लक्षणों के सामने आने पर सबको लगने लगता है कि व्यक्ति का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है अतः इसे साइकोलॉजिस्ट (मनो- चिकत्सक /दिमाग़ का डाक्टर )की जरूरत है!

व्यक्ति पर सबसे बड़ा आघात (Biggest blow on a person)

किसी मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति पर पागल होने का आरोप शायद व्यक्ति पर अब तक होने वाले आघातों में सबसे बड़ा आघात होता है !

हम अपने हाथों से समस्याओं को निमंत्रण देते हैं और इसके लिए उत्तरदाई किसी और को ठहराते हैं !हम सत्य को आत्मसात क्यों नहीं करते यदि हम जीवन के इस सत्य को अपने जीवन में उतार ले ,तो सदैव के लिए टेंशन फ्री हो सकते है !

अगले ब्लॉग में हम बात करेंगे चिंता के कारण और निवारण की तब तक हँसते रहिये हँसाते रहिये जीवन अनमोल है मुस्कुराते रहिए , अगले ब्लॉग में फिर मुलाक़ात होगी !

धन्यवाद

🙏🙏🙏