shayree

” तो ये सिम्तों में बटा क्या है !”

वक्त सिलसिला है !कब रुका है ?कब थमा है ?

कब बदल जाये ? कोई जाने नहीं !

कभी मौसम !कभी सावन !!

दिल जो टूटे तो ये – खुद ही दवा है

वक़्त क्या है ?सिलसिला है !

हम हैं मेहफ़ूज़ बहुत , यूं हमें लगता है !

वक़्त कह देता है लेकिन ! सच क्या है ?

वो शहर भी , है शजर भी, वो हवा है, वही दर भी !

सब गुज़र जाता है ,तो ये माजरा क्या है ?

नम आखों मैं छुपा है !क्या राज़ कोई गहरा ?

ये गम जो नहीं !तो भला क्या है ?

कोई अपना या पराया ,कुछ नहीं होता !

है अगर सच , तो ये सिम्तों में ,बटा क्या है ?